सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

सियापा कर खुद को लाचार मुख्यमंत्री साबित कर रहे हैं गहलोत

गांधीवादी विचारधारा की छाप लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जिस तरह प्रशासनिक तंत्र की नाकामी के बारे में बेबाकी से जमीनी हकीकत बयां कर जन संवेदना के साथ हमदम होने की कोशिश कर रहे हैं, उससे उन्हें लाभ हो रहा है या नहीं, लेकिन नुकसान जरूर हो रहा है। उन्हें एक लाचार मुख्यमंत्री की श्रेणी में गिना जा रहा है, जिसको प्रशासन की खामियां तो पता हैं, मगर वह उन्हें दुरुस्त नहीं कर पा रहा।
बीते रविवार को उन्होंने पेट्रोलियम पदार्थों में मिलावट की जांच व रोकथाम के लिए प्रदेशव्यापी अभियान की शुुरुआत करते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली की पोल खोलते हुए स्वयं ही स्वीकार कर लिया कि कोई एसएचओ किसी थाने का चार्ज लेने के सात-आठ दिन तक तो डंडा बजा कर काम करते हैं और उसके बाद उनकी सब सेटिंग हो जाती है। वे यह भी जानते हैं कि अपराधी कौन है और कहां छुपा हुआ है, फिर भी अपराधी पकड़ में नहीं आता। असल में वह तो शांत हो कर ड्यूटी टाइम में क्वार्टर में सो जाता है और बाकी काम हैड कॉन्सटेबल व सिपाही कर लेते हैं।
उनका यह बयान कदाचित काफी प्रतिशत तक सच हो सकता है, मगर एक मुख्यमंत्री का इस प्रकार बयान देना क्या यह साबित नहीं करता है कि वे भी उन एसएचओ की तरह ही तो हैं, जिसे सब कुछ पता होता है, फिर भी कुछ नहीं कर रहा। हालांकि इस प्रकार का बयान देने के बाद वे प्रशासनिक तंत्र को सुधारने के प्रति अपना संकल्प तो जाहिर करते हैं, मगर करते कुछ नहीं। गर कुछ करते भी हैं तो उसका परिणाम तो कहीं नजर नहीं आता। वरना क्या वजह है कि मुख्यमंत्री को सरकारी तंत्र की पोल तो पता है, मगर उसका आज तक इलाज नहीं हो पाया है। इससे साफ जाहिर होता है कि वे एक लाचार मुख्यमंत्री हैं और अपनी नाकामी खुद ही उजागर कर रहे हैं।
यह पहला मौका नहीं है कि गहलोत ने मुख्यमंत्री जैसे दायित्वपूर्ण ओहदे पर बैठ कर आम आदमी की तरह सियापा करते हुए जमीनी हकीकत बयां की हो। वे यह स्वीकार कर चुके हैं कि निजी अस्पताल लाश को भी वेंटीलेटर पर रख कर नोट कमाते हैं, पेंशन के लिए बाबू चक्कर लगवाते हैं, पुलिस ही शराब तस्करों को सूचना दे कर छापा मारती है और तस्कर भाग जाते हैं। उनकी सभी बातें सच ही प्रतीत होती हैं। भले ही पूरा तंत्र ऐसा न हो, मगर ऐसे उदाहरण हम आम जिंदगी में अपने आसपास देखते ही हैं। ऐसा नहीं कि वे ऐसी बातें करके प्रशासन को दुरुस्त करने की बात नहीं करते, जरूर करतें हैं, मगर नतीजा ढाक के तीन पात ही है। यह उनकी लाचारी के साथ असफलता का भी द्योतक है। कितनी अफसोसनाक बात है कि जो बात विपक्षी दल को शोभा देती है, वह वे सत्ता में बैठ कर कर रहे हैं। हालांकि उनका तर्क ये हो सकता है कि वे सच ही तो बयां कर रहे हैं और उनका खरा-खरा कहने का अंदाज भले ही लोगों को अच्छा लगता हो, मगर इससे वे प्रशासनिक तंत्र की नाकामी से अपने आप को अलग नहीं कर सकते। अपराध या नाकामी की स्वीकारोक्ति कभी नाकामी को डाइल्यूट नहीं कर देती। उसके लिए काम करके दिखाना होता है। उससे भी बड़ी बात यह है कि आपको मर्ज भी पता है, फिर भी उसका इलाज नहीं हो पा रहा तो जरूर आपकी कार्यप्रणाली में ही कहीं गड़बड़ है।
शुद्ध के लिए युद्ध अभियान को ही लें। इससे जाहिर तौर पर मिलावटियों में भय व्याप्त हुआ है, मगर इसका लाभ आम आदमी को जितना नहीं मिला, उससे ज्यादा मिलावट रोकने वाले तंत्र से जुड़े अधिकारियों को ही मिला है। इसकी वजह ये है कि वे अधिकारी सरकार के सख्त होने की दुहाही दे कर अपनी रेट बढ़ा रहे हैं। आरोप यहां तक है कि जब से यह अभियान शुरू हुआ है, खाद्य मंत्री इसका दुरुपयोग कर रहे हैं। अर्थात भले ही छोटे मिलावटियों पर शिकंजा कसा जा रहा हो, मगर बड़े मिलावटियों से तो सैटिंग ही हो रही है। मंत्री के बदनाम होने पर भी उसके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करने से उलटे गहलोत की ही छवि खराब हो रही है। ऐसा कैसे हो सकता है कि आपके मंत्रीमंडल के सदस्य तो बदनाम होते जाएं और उनके लीडर यानि आप खुद गांधीवादी कहलाते हुए अपने कुर्ते-पायजामे पर एक भी दाग न लगने दें।
रहा सवाल उनके ताजा बयान का, इससे एसएचओ सुधर जाएंगे, इसकी संभावना कम ही नजर आती है। उलटे पुलिस का मनोबल ही गिरेगा। पुलिस वाले कहेंगे कि जब एक मुख्यमंत्री ही हमें चोर ठहरा रहा है तो चोरी करने में हर्ज ही क्या है। कोई भी व्यक्ति केवल बदनामी से ही डरता है। अगर आप उसे बदनाम ही कर देंगे तो वह और निर्लज्ज हो जाएगा। एसएचओ पर आरोप लगाने की बजाय अगर वे ऐसे एसएचओ के खिलाफ सीधे कार्यवाही करते तो वह ज्यादा कारगर परिणाम देने वाला हो सकता था। अगर आप सख्ती बरतते हुए ऐसे एसएचओ के खिलाफ कार्यवाही करते तो दूसरे एसएचओ में भी खौफ कायम होता। और अगर इस प्रकार सार्वजनिक रूप से पूरी पुलिस जमात को ही जलील कर देंगे तो वह भले ही अनुशासन के कारण चुप रह जाएगी, मगर पिछले से पिछले चुनाव की तरह राज्य कर्मचारियों की तरह से आगामी चुनाव में भी सबक सिखा देगी।
-गिरधर तेजवानी

1 टिप्पणी:

  1. HOME MINISTER AUR DGP KI JWABDEHI KO NAJAR ANDAJ KAR LACHARI BAYA KARDI.MAHABHART ME JASE SAMJDARO NE DHRATRAST KE AAGE NATMASTAK HO KAR GALAT KOBHI ANGIGAR KARLIYA THA NUKSHAN KHUD KA BHI KIYA AUR ANUYAYIYO KA BHI HUAA WALI KAHAWAT KO CHARITATH KIYA JA RAHA HAI JANTA BHUJAT RAHI HAI EASE KANUN KE RAKHWALO KO KYOKI UNKA KOI KUCH KAR NAHI SAKTA .CM SAB JANTE HAI LEKIN AMLI JAMA PAHNANE ME SANKOCH KAISA .

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