शुक्रवार, 11 मार्च 2011

हत्या के लिए पुलिस जिम्मेदार कैसे हो गई?

किशनगढ़ के कांग्रेस विधायक नाथूराम सिनोदिया के पुत्र भंवर सिनोदिया का अपहरण होने के बाद हत्या कर दिए जाने पर राजस्थान विधानसभा में भाजपा ने जम कर हंगामा किया। भाजपा विधायकों ने पुलिस पर ढि़लाई का आरोप लगाते हुए गृहमंत्री शांति धारीवाल से इस्तीफे की मांग कर डाली। धारीवाल के जवाब से असंतुष्ट विपक्ष ने सदन का बहिष्कार भी कर दिया। विपक्ष की यह भूमिका यंू तो सहज ही लगती है, मगर गहराई से विचार किया जाए तो यह पूरी तरह से बेमानी ही है।
अव्वल तो ऐसे विवादों में होने वाली हत्याएं सुनियोजित होते हुए भी उसकी जानकारी पुलिस को नहीं होती, जब तक कि संबंधित पक्ष इस प्रकार की आशंका न जाहिर करें। भंवर सिनोदिया की हत्या को भी ऑर्गेनाइज क्राइम की श्रेणी नहीं गिना जा सकता, जिसके बारे में पुलिस को घटना से पहले पता लग जाए। यदि किसी के बीच किसी सौदेबाजी का विवाद हो गया है और उसको लेकर अचानक किसी की हत्या कर दी जाती है, तो पुलिस को सपना कैसे आ सकता है कि इस प्रकार की वारदात हो सकती है? ऐसी हत्या के लिए भी पुलिस को दोषी देने की प्रवृत्ति कत्तई उचित नहीं कही जा सकती। भला इसमें पुलिस की ढि़लाई कहां से आ गई? पुलिस भला इस हत्या को कैसे रोक सकती थी? रहा सवाल हत्या के बाद पुलिस की भूमिका का तो उसने त्वरित कार्यवाही करके लाश का पता लगा लिया और दो आरोपियों को गिरफ्तार भी कर लिया। इतना ही नहीं उसने कानून-व्यवस्था के मद्देनजर तब हत्या के तथ्य को उजागर नहीं किया, जब तक कि लाश नहीं मिल गई। पुलिस को शाबाशी देना तो दूर, उसे गाली बकने की हमारी आदत सी बन गई है। इससे पुलिस अपना कर्तव्य निर्वहन करने को बाध्य हो न हो, हतोत्साहित जरूर होती है। माना कि विपक्ष को दबाव बनाने के लिए इस प्रकार विरोध जताना पड़ता है, मगर ऐसी हत्या, जिसके लिए न तो पुलिस जिम्मेदार है, न कानून-व्यवस्था और न ही गृहमंत्री, पुलिस को दोषी ठहाराना व गृहमंत्री के इस्तीफे की मांग करना हमारी इस प्रवृत्ति को उजागर करता है कि हंगामा करना ही हमारा मकसद है, हालात से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। सवाल ये उठता है कि क्या भाजपा के राज में इस प्रकार ही हत्याएं नहीं हुईं? हालांकि तब कांग्रेस ने भी इसी प्रकार की प्रवृत्ति का इजहार किया था, लेकिन न तो तब के गृहमंत्री ने इस्तीफा दिया और न ही इस सरकार के गृहमंत्री इस्तीफा देने वाले हैं, मगर हमारी आदत है, इस्तीफा मांगने की सो मांगेगे। अकेले राजनीतिक लोग ही नहीं, हमारे मीडिया वाले भी कभी-कभी इस प्रकार की गैरजिम्मेदार हरकत कर बैठते हैं। गुरुवार को जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सिनोदिया गांव में भंवर सिनोदिया के पिता विधायक नाथूराम सिनोदिया व परिजन को सांत्वना देने पहुंचे तो एक मीडिया वाले यह सवाल दाग दिया कि पहले बीकानेर में युवक कांग्रेस नेता की हत्या और अब विधायक पुत्र की हत्या को आप किस रूप में लेते हैं? एक अन्य ने पूछा कि क्या इससे ऐसा नहीं लगता कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था बिगड़ गई है? जाहिर तौर पर गहलोत को यह कहना पड़ा कि क्राइम तो क्राइम है, इसका राजनीतिक अर्थ नहीं होता। सवाल ये उठता है कि हम सवाल पूछते वक्त ये ख्याल क्यों नहीं रखते कि ऐसे सवाल का क्या उत्तर आना है? अगर एक ही मामले में राजनीतिक रंजिश के कारण कांग्रेसियों की हत्या होती तो समझ में आ सकता था कि यह सवाल जायज है, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि हम केवल कुछ पूछने मात्र के लिए ऐसे सवाल दागते हैं।
बहरहाल, अब जब कि जांच ओएसजी को दी जा चुकी है, उम्मीद की जानी चाहिए कि हत्या के पीछे अकेले व्यक्तिगत या व्यापारिक रंजिश थी, या फिर इसके पीछे कोई राजनीतिक द्वेषता थी, इसका पता लग जाएगा। वैसे पुलिस अब ज्यादा सतर्क होना पड़ेगा, क्योंकि जिस प्रकार विधायक के जवान बेटे की हत्या की गई है, उससे प्रतिहिंसा की आशंका तो उत्पन्न होती ही है।

गुरुवार, 10 मार्च 2011

वसुंधरा की आक्रामकता से कांग्रेसी खुश


हालांकि यूं तो हर राजनीति कार्यकर्ता अपने दल का ही पक्ष लेता है और उसे मजबूत करने की भी कोशिश करता है, लेकिन कभी-कभी ऐसा भी होता है कि एक पार्टी का कार्यकर्ता दूसरे की पार्टी के मजबूत होने पर भी खुश होता है। कुछ ऐसा ही इन दिनों असंतुष्ट कांग्रेसी कार्यकर्ता के साथ हो रहा है। वे पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के विपक्ष का नेता बनने पर बेहद खुश हैं। जैसे ही वसुंधरा शेरनी की दहाड़ती हैं तो कुछ कांग्रेसियों के दिल आल्हाद से भर जाते हैं। हालांकि यह तथ्य है तो चौंकाने वाला, मगर है सौ फीसदी सच।
असल में कांग्रेस के सत्ता में आने के दो साल बीत चुके हैं, फिर भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा कार्यकर्ताओं को मलाईदार राजनीतिक पदों पर नियुक्त नहीं किया गया है। इससे अनेक कार्यकर्ता बेहद नाराज हैं। वे पार्टी अनुशासन के कारण कुछ बोल नहीं पा रहे, लेकिन अंदर ही अंदर कुड़ रहे हैं। सोचते हैं कि ऐसी पार्टी के लिए काम करने से फायदा ही क्या जो उनकी खैर-खबर न ले। आखिरकार वोट के लिए तो उन्हें ही जनता के बीच जाना पड़ता है। अगर सरकार उन्हें कुछ नहीं देगी तो वे अपने निचले कार्यकर्ताओं को कैसे खुश रखेंगे। उनकी सोच ये भी है कि गहलोत ने दो साल तो खराब कर दिए, अब भी कुछ नहीं मिलेगा तो वे आखिर कितने दिन तक पार्टी के पिदते रहेंगे। कुछ दिन पहले यह असंतोष उभर कर आया भी लेकिन फिर दब गया। अब जबकि वसुंधरा राजे विधानसभा में विपक्ष की नेता दुबारा बनी हैं, कांग्रेस कार्यकर्ताओं को अहसास है कि इससे भाजपा मजबूत होगी और गहलोत के लिए परेशानी खड़ी करेगी। सुना तो ये तक है कि वसुंधरा राजे ने भाजपा हाईकमान को यह तक झलकी दिखाई है कि वे कांग्रेस की सत्ता पलट देंगी। इसके पीछे तर्क ये माना जा रहा है कि कांग्रेस के ही अनेक विधायक इस कारण गहलोत से बेहद खफा हैं कि उन्होंने न तो उनको मंत्री पद से नवाजा और न ही उनके कार्यकर्ताओं को राजनीतिक नियुक्ति दी। उन विधायकों पर वसुंधरा डोरे डाल रही हैं। ऐसे में गहलोत परेशानी महसूस कर रहे हैं। वे जानते हैं कि अगर उन्होंने अपने विधायकों व कार्यकर्ताओं को खुश नहीं किया तो वे अंदर ही अंदर वसुंधरा की मदद कर सकते हैं। अत: अब उम्मीद की जा रही है कि जैसे ही विधानसभा सत्र समाप्त होगा, गहलोत नियुक्तियों का पिटारा खोल देंगे। कार्यकर्ताओं को भी उम्मीद है कि वसुंधरा के दबाव में आ कर गहलोत जल्द ही राजनीतिक नियुक्तियां करेंगे।

आरक्षण के मुद्दे ने कर दिया बोर्ड कर्मचारी संघ बंटाधार


पदोन्नति में आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट की ओर से अवैध ठहराये जाने के बाद समता मंच के आंदोलन के चलते राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के कर्मचारियों की समरसता भंग हो गई है। कर्मचारी बाकायदा दो गुटों में बंट गए हैं और मुकदमेबाजी भी हो गई है। ऐसे में बोर्ड कर्मचारी संघ में भी जबरदस्त खींचतान शुरू हो गई है। एक गुट ने तो बाकायदा नए चुनाव कराने की मांग कर डाली है।
दरअसल समता मंच की मांग के अनुरूप भारी दबाव में बोर्ड प्रबंधन ने पदावनत कर्मचारियों को उनके पुराने पदों पर भेज तो दिया, लेकिन इसी बीच अनुसूचित जाति के सहायक निदेशक छगनलाल व सवर्ण कर्मचारियों के बीच हुई नोंकझोंक मुकदमेबाजी तक पहुंच गई। छगनलाल ने जहां एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करवाया, वहीं सवर्ण वर्ग के कर्मचारी नेता कैलाश खंडेलवाल ने भी छगनलाल के खिलाफ रास्ता रोक कर मारपीट का मुकदमा दर्ज करवा दिया। हालांकि बोर्ड प्रबंधन शुरू से ही चाहता था कि बोर्ड कर्मचारी संघ को मध्यस्थ बनाया जाए, लेकिन समता मंच के कर्मचारी इस कारण तैयार नहीं हुए कि एक तो उनके अनुसार कर्मचारी संघ बोर्ड अध्यक्ष की गोदी में बैठा हुआ था और दूसरा उसके अध्यक्ष सतीश जाटव अनुसूचित जाति वर्ग से हैं। मंच को उम्मीद ही नहीं थी कि कर्मचारी संघ न्यायोचित भूमिका अदा करेगा। ऐसे हालात में कर्मचारी संघ ने भी तटस्थ रहना ही उचित समझा। जाटव अनुसूचित जाति वर्ग के होने के बाद भी सभी वर्गों के सहयोग से अध्यक्ष बने थे, इस कारण उनके सामने भी धर्मसंकट था। अगर वे अनुसूचित जाति वर्ग का पक्ष लेते तो सामान्य वर्ग नाराज हो जाता और सामान्य वर्ग का पक्ष लेते तो अपने वर्ग को नाराज कर बैठते। उनकी तटस्थता समता मंच को बुरी लग गई। उनकी शिकायत है कि सहायक निदेशक छगनलाल ने झूठा मुकदमा दर्ज करवाया है, लेकिन संघ खामोश बना हुआ है। वह कर्मचारियों की कोई मदद नहीं कर रहा है। सवाल ये उठता है कि जब बोर्ड प्रबंधन अनुरोध कर रहा था कि कर्मचारी संघ को मध्यस्थ बनाना ठीक रहेगा तो कर्मचारियों ने उसे सिरे से क्यों ठुकरा दिया? ऐसे में वे अब कैसे उम्मीद कर रहे हैं कि वह उनकी मदद करे? इस लिहाज से हालांकि संघ की चुप्पी जायज प्रतीत होती है, लेकिन अब जब कि बोर्ड के कर्मचारी दो गुटों में बंट गए हैं व बड़ा गुट संघ के खिलाफ हो गया है, तो मौजूदा कार्यकारिणी संकट में आ गई है। बोर्ड कर्मचारी संघ में करीब 400 वोटर हैं, जबकि 228 कर्मचारियों ने नए चुनाव कराने के ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। अर्थात नई गुटबाजी के बाद बड़ा गुट संघ पर कब्जा करना चाहता है। देखते हैं अब क्या होता है? बहरहाल, कर्मचारी संघ का जो कुछ भी हो, मगर ताजा विवाद से बोर्ड का माहौल तो खराब हुआ ही है।

सच बोल कर भी फंस गए शिक्षा बोर्ड अध्यक्ष


एक बहुत पुरानी उक्ति है कि सच अमूमन कड़वा ही होता है। इसी कारण सच्चाई कई बार गले पड़ जाती है। यह उक्ति हाल ही राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड अध्यक्ष डॉ. सुभाष गर्ग पर सही उतर आई। नतीजतन उन्हें अपने एक दिन पहले दिए सच्चे बयान को भी दूसरे दिन सुधारना पड़ गया। हालांकि नकल के मुद्दे पर डॉ. गर्ग ने बयान ठीक ही दिया था कि शिक्षा कर्मी ही इसके लिए जिम्मेदार हैं, मगर जैसे ही बयान छपा, उन्हें लगा कि इससे पूरे राजस्थान के शिक्षा कर्मी उबल पड़ेंगे, तो दूसरे दिन ही उन्होंने अपने बयान को सुधार लिया।
जाहिर सी बात है कि परीक्षाएं भले ही बोर्ड आयोजित करता है, लेकिन धरातल पर उसे अंजाम दिलवाने की भूमिका तो शिक्षा कर्मी ही अदा करते हैं। ऐसे में जहां भी नकल होती है, वह शिक्षा कर्मियों की लापरवाही से ही होती है। जहां सामूहिक नकल होती है, वहां तो निश्चित रूप से संबंधित स्कूल प्रबंधन दोषी होता है। इस लिहाज से डॉ. गर्ग का बयान गलत नहीं था, लेकिन जिस ढंग से बयान छपा, उससे संदेश ये गया कि पूरा शिक्षा कर्मचारी जगत ही जिम्मेदार है, जब कि वास्तव में इसके लिए कतिपय शिक्षा कर्मी ही दोषी होते हैं। डॉ. गर्ग को आभास हो गया कि उन्होंने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है, वो भी तब जब कि बोर्ड की परीक्षाएं सिर पर हैं। भले ही नकल के लिए कुछ शिक्षा कर्मी जिम्मेदार हों, मगर शिक्षा कर्मियों के सहयोग के बिना बोर्ड परीक्षा आयोजित भी नहीं कर सकता। इस कारण उन्होंने दूसरे ही दिन नया बयान जारी कर कह दिया कि परीक्षाओं में नकल की प्रवृत्ति के लिये अभिभावक, विद्यार्थी, शिक्षक और समाज समान रूप से जिम्मेदार हैं। उन्हें स्वीकार करना पड़ा कि बोर्ड की परीक्षाओं का आयोजन शिक्षा विभाग की संयुक्त भागीदारी के बिना संभव नहीं है। इसलिए शिक्षा विभाग और बोर्ड एक सिक्के के दो पहलू के समान एक दूसरे के पूरक हैं।

सोमवार, 7 मार्च 2011

गहलोत ने भी दाग दिया सवाल, ये छोटा गहलोत कौन है?


आखिर तंग आ कर मुख्यमंत्री गहलोत ने भी सवाल दाग ही दिया कि पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे बताएं कि ये छोटा गहलोत कौन है? उल्लेखनीय है कि विपक्षी दल की नेता बनने के बाद वसुंधरा बार-बार अजमेर के जमीन घोटाले का हवाला देते हुए छोटे गहलोत का जिक्र कर रही हैं। हालांकि सब जानते हैं कि वसुंधरा किस ओर इशारा कर रही हैं, क्योंकि विधानसभा के पटल पर विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी ने जो परचा रखा, उसमें सब साफ लिखा है, मगर गहलोत समझते हुए भी सवाल उठा रहे हैं कि छोटा गहलोत कौन है? वे चाहते हैं कि वसुंधरा गोलमोल आरोप लगाने की बजाय खुल कर अपने मुंह से आरोप लगाएं ताकि उसका मुंह तोड़ जवाब दिया जा सके।
जाहिर सी बात है कथित भूमि घोटाले में छोटे गहलोत का ऑन दी रिकार्ड कहीं नाम नहीं है, ऐसे में भला गहलोत क्यों झूठा आरोप बर्दाश्त करने लगे। रहा सवाल कथित घोटाले से जुड़े लोगों के छोटे गहलोत से संबंध का सवाल तो पहले तो यह सबित करना होगा कि संबंध हैं भी नहीं, उसके अतिरिक्त किसी के किसी से संबंध होने मात्र से तो यह साबित नहीं हो जाता कि घोटाले में छोटे गहलोत शामिल हैं। उससे भी बड़ी बात ये है कि जिस कथित भूमि घोटाले के संदर्भ में बात चल रही है, उसमें तो गहलोत ने महज इसलिए त्वरित कार्यवाही करते हुए जमीन का आवंटन रद्द कर दिया है, क्यों कि एक परचे में छोटे गहलोत का हवाला दिया हुआ है। गहलोत अपने सफेद कुर्ते के प्रति बेहद सजग हैं। मंत्रियों पर भले ही आरोप लगते रहें, मगर वे नहीं चाहते कि उस पर खुद पर कोई दाग लग जाए। ठीक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसी स्थिति है। वे भी कई मंत्रियों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगने के बाद बावजूद खुद को मिस्टर क्लीन बनाए हुए हैं। उसी नक्शे कदम पर चलते हुए गहलोत व्यक्तिगत आरोप सुनने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में गहलोत ने वसुंधरा को चुनौती दे दी है कि वे साफ बताएं कि छोटा गहलोत कौन हैं, ताकि उसकी जांच कराई जा सके। इस चुनौती के बाद देखें कि वसुंधरा क्या पटल वार करती हैं। चुप तो रहने वाली वे भी नहीं हैं। खैर, अपना तो सिर्फ यह कहना है कि ऐसा न हो कि वसुंधरा भी केवल पर्चे को आधार बना कर छोटे गहलोत का वास्तविक नाम न बताएं, उसे सप्रमाण साबित भी करें, तभी दूध का दूध और पानी का पानी होगा। वरना केवल छोटे गहलोत को पानी की तरह बिलोवणा कर के कोई मक्खन नहीं निकलने वाला है।

मेयरों की कमजोर हालत के लिए सरकार ही जिम्मेदार है

पिछले कुछ दिनों से यह साफ महसूस किया जाने लगा है कि अजमेर व जयपुर के कांग्रेसी मेयर अपने आपको कमजोर महसूस कर रहे हैं और उन्हें काम करने में परेशानी पेश आ रही है। दोनों ही स्थानों पर बोर्ड में भाजपा का बहुमत है। जयपुर की मेयर ज्योति खंडेलवाल को लगातार विपक्ष से संघर्ष करना पड़ रहा है। हर साधारण सभा में सिर फुटव्वल की नौबत आ जाती है। निगम की विभिन्न समितियों के गठन पर भी भारी विवाद हो चुका है। यहां तक मामले में हाईकोर्ट को दखल करना पड़ गया। राजनीतिक दलों के टकराव का परिणाम ये है कि अफसरशाही हावी हो गई है। इससे कुंठित हो कर आखिरकार वे सीधे अफसरों पर ही हमला कर बैठीं और अफसर लामबंद हो गए। इस प्रकार जनप्रतिनिधियों व अफसरों के बीच एक नए विवाद का जन्म हो गया। अब तराजू सरकार के हाथ में आ गई है।
इसी प्रकार अजमेर में मेयर कमल बाकोलिया को भी काम करने का फ्री हैंड इसलिए नहीं है कि यहां भी भाजपा पार्षदों की संख्या ज्यादा है और निगम की साधारण सभाओं में टकराव अवश्यंभावी हो गया है। उनकी इस कमजोर स्थिति का परिणाम ही है कि वे ठीक से काम नहीं कर पा रहे और जिला प्रशासन को निगम के सफाई, अतिक्रमण व यातायात जैसे मूलभूत कामों में हस्तक्षेप का मौका मिल गया। हालांकि इसमें जिला प्रशासन की मंशा पर शक नहीं किया जा सकता, लेकिन इससे निगम की स्वायत्तता पर तो प्रश्नचिन्ह लग ही गया है। हालांकि यह सही है कि निगम की असफलताओं की वजह से ही प्रशासन को दखल करने का मौका मिला है, लेकिन इससे जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले तो अपने आपको ठगा सा महसूस कर रहे हैं। यूं मेयरों को सीधे काफी अधिकार दिए हुए हैं, लेकिन परिस्थितियां ही ऐसी हैं कि वे उनका ठीक से इस्तेमाल नहीं कर पा रहे। कुल मिला कर दोनों ही निगमों में स्थिति ऐसी आ गई है कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों का तो कोई मतलब ही नहीं रह गया है और अफसरों को मनमानी करने का मौका मिला हुआ है।
अगर जरा गौर करें कि ऐसी स्थितियां उत्पन्न क्यों हुई हैं तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह केवल इसी कारण से है कि सरकार ने इस बार निकाय चुनावों में निकाय प्रमुखों का स्वतंत्र चुनाव करवाया है। वस्तुत: जिस वक्त निकाय प्रमुखों का चुनाव सीधे जनता के वोटों से कराने का निर्णय किया गया था, तभी यह समझ लेना चाहिए था कि निकाय प्रमुख तो एक पार्टी का और बोर्ड दूसरी पार्टी का बन सकता है और उससे समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, लेकिन उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। इसी का परिणाम ये हुआ कि अजमेर व जयपुर सहित अनेक निकायों में मेयर, सभापति व अध्यक्ष तो एक पार्टी का है, जबकि बोर्ड दूसरी पार्टी का बन गया। जयपुर व अजमेर में चल रहा टकराव तो उभर कर आ गया, जबकि अन्य में अंदर ही अंदर संघर्ष जारी है और इसी के कारण काम प्रभावित हो रहे हैं। इन संस्थाओं को जो कर्तव्य है, उसे वे पूरा नहीं कर पा रही हैं।
स्थानीय निकायों को लेकर और भी विसंगतियां हैं। चुनाव होने के बाद में सरकार को ये समझ में आया कि नगरपालिका कानून कि धारा 53 दिक्कत वाली है, जिसके तहत निकाय अध्यक्षों के खिलाफ चुनाव के एक साल बाद अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है। सरकार को लगा कि यह ठीक नहीं है तो उसने इस धारा को हटा दिया। हालांकि बाद में हाईकोर्ट ने उस पर रोक लगा दी। ऐसी स्थिति में मेयर चाह कर भी ईमानदारी से काम नहीं कर सकता, क्योंकि उसे कुर्सी पर बने रहने के लिए पार्षदों की गलत अपेक्षाओं को भी पूरा करना होगा। वस्तुत: धारा 53 का प्रावधान दोनों ही पार्टियों के लिए एक बड़ा सरदर्द है, लेकिन ऐसा समझा जाता है कि सरकार को ज्यादा चिंता अपने निकाय प्रमुखों की हुई। बहरहाल, अब चर्चा है कि सरकार इसके लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित करेगी। सरकार ने एक चालाकी ये की है कि धारा 39 को बरकरार रखा है, जिसके तहत वह चाहे तो किसी भी निकाय प्रमुख को हटा सकती है। यानि सरकार के इस कदम से जहां उसके निकाय प्रमुख तो सुरक्षित रखना चाहती है, वहीं विपक्षी दल भाजपा व अन्य के प्रमुखों पर तलवार लटका के रख रही है।
हालांकि कांग्रेस की अंदरूनी कलह के कारण सरकार अभी तक निकायों में पार्षदों का मनोनयन नहीं कर पाई है, लेकिन सुना है कि सरकार मनोनीत पार्षदों को भी वोट देने का अधिकार देने का मानस रखती है। इस आशय के संकेत स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल दे चुके हैं। यदि उसे लागू कर दिया गया तो यह लोकतंत्र के लिए काला अध्याय बन जाएगा। भला राजनीतिक आधार पर मनोनीत पार्षद को चुने गए पार्षद के बराबर कैसे माना जा सकता है? ऐसे में चुने हुए बोर्ड का तो कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा। यदि सरकार ने यह प्रावधान किया तो अनेक निकायों में जहां बोर्ड विपक्ष का है, वहां कांग्रेस का बहुमत हो जाएगा और वे मनमानी करने को उतारु हो जाएंगे। जनता के माध्यम से चुन कर आए भाजपा पार्षद केवल मुंह ही ताकते रहेंगे। हालांकि यह फिलहाल काल्पनिक ही है, लेकिन यदि ऐसा करने की गलती की भी गई तो उसे कोर्ट में चुनौती दिया जाना भी पक्का है।

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

साबित हो गई राजेश यादव की मुख्यमंत्री से नजदीकी


पिछले दिनों जब अजमेर के तत्कालीन जिला कलेक्टर राजेश यादव को सीएमओ में मुख्यमंत्री के विशिष्ट सचिव के रूप में तैनात किया गया था, तभी यह तथ्य स्थापित हो गया था कि वे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खासमखास हैं। कुछ लोग इसे अजमेर यूआईटी के घपले से जोड़ कर सजा के रूप में गिना रहे थे, जब कि अपुन ने तभी कह दिया था कि उनका कद इससे बढ़ गया है। उस वक्त मीडिया ने भी इस बात पर आश्चर्य जताया था कि सीएमओ में पहले से दो आईएएस होने के बावजूद यादव सहित दो युवा आईएएस क्यों लगाए गए हैं। कुछ लोगों का मानना था कि सीएमओ का अफसर एक बड़े बाबू जैसा होता है, क्योंकि उसके पास स्वयं में कोई अधिकार निहित नहीं होता और केवल मुख्यमंत्री व उच्चाधिकारियों के आदेश का पालन करना मात्र होता है। यादव को सीएमओ में लगाने के राजनीतिक हलकों में जो भी अर्थ लगाए गए, मगर इससे अजमेर में कांग्रेस के उन नेताओं के सीने पर सांप लौटने लगे थे, जिनको यादव ने अपने कार्यकाल में कभी नहीं गांठा। वे कई बार इसकी शिकायत मौखिक रूप से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से करते रहे, मगर यादव का बाल भी बांका नहीं हुआ। बाल बांका होना तो दूर, उलटे यादव का कद और बढ़ गया।
हाल ही जब जयपुर नगर निगम की महापौर ज्योति खंडेलवाल और निगम में तैनात चार आरएएस के बीच टकराव हुआ तो सरकार सकते में आ गई। ज्योति खंडेलवाल ने सार्वजनिक रूप से आरएएस अफसरों को अतिक्रमण किंग करार दिया तो अफसरों ने भी लामबंद हो कर विरोध जता दिया। नगरीय विकास मंत्री शांति धारीवाल तक भौंचक्के रह गए। गुत्थी इतनी उलझ गई कि मुख्यमंत्री को संकटमोचक के रूप में राजेश यादव ही याद आए और गुरुवार की देर रात उन्हें निगम का सीईओ बनाने के आदेश जारी कर दिए। जयपुर नगर निगम का सीईओ होना कोई छोटी-मोटी बात नहीं। एक तो जयपुर नगर निगम प्रदेश के मुख्यालय का स्थानीय निकाय है, जिस पर पूरे प्रदेश की नजर रहती है। दूसरा वहां मेयर तो कांगे्रस की ज्योति खंडेलवाल तो सदन में भाजपा का बहुमत होने के कारण आए दिन सिर फुटव्वल होती है। फिर यदि मेयर व आरएएस अफसरों में सीध टकराव हो जाए तो समझा जा सकता है कि वह जंग का कैसा मैदान बना हुआ है। ऐसे में उसमें सरकार के प्रतिनिधि के तहत सीईओ के पद पर काम करने वाला कितना महत्वपूर्ण हो जाता है, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। बहरहाल, अब तो यह पूरी तरह साफ हो गया है कि यादव मुख्यमंत्री के खासमखास हैं।
बोर्ड अध्यक्ष व संघ के हाथ में आ गई तराजू
राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में कर्मचारी संघ को हाशिये पर रख कर समता मंच की ओर से कामय दबाव की वजह से अध्यक्ष डॉ. सुभाष गर्ग ने पदावनत कर्मचारियों को पुन: पुरानी सीटों पर तो भेज दिया, लेकिन परिणाम में बोर्ड कर्मचारी खुल कर दो खेमों में बंट गए हैं। एक वर्ग समता मंच से जुड़े कर्मचारियों के उपसचिव छगनलाल के साथ की गई कथित बदसलूकी के कारण लामबंद हो गया है। छगनलाल ने भी बदसूलकी करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करवा दिया है। ऐसे में अपनी मांग मनवा लेने के बाद भी समता मंच के कर्मचारी रक्षात्मक मुद्रा में आ गए हैं। जाहिर तौर पर ऐसे में अब एक बार फिर ट्यूनिंग बैठा कर चल रहे बोर्ड अध्यक्ष डॉ. गर्ग व कर्मचारी संघ के हाथ में तराजू आ गई है।
यहां उल्लेखनीय है कि समता मंच के कर्मचारियों ने बोर्ड अध्यक्ष डॉ. गर्ग व कर्मचारी संघ की ट्यूनिंग के कारण संघ पर अविश्वास रखते हुए उसकी मध्यस्थता को नकार कर बोर्ड प्रशासन पर सीधे दबाव बनाया। बोर्ड सचिव मिरजूराम शर्मा के आग्रह के बावजूद कर्मचारियों ने यह कह कर संघ की मध्यस्थता से इंकार कर दिया कि संघ की ही माननी होती तो वे सीधे क्यों आते। उन्होंने बोर्ड अध्यक्ष डॉ. गर्ग को भी घेर लिया। चूंकि समता मंच की मांग सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप थी, इस कारण डॉ. गर्ग को झुकना पड़ा। मगर बोर्ड सचिव मिरजूराम शर्मा के घेराव के दौरान अप्रत्याशित रूप से मौके पर आए उप सचिव छगनलाल के साथ कथित तौर पर आई गाली-गलौच की नौबत समता मंच पर भारी पड़ गई है। सच्चाई क्या है, ये तो घटनास्थल पर मौजूद कर्मचारी व अधिकारी ही जानें, मगर अब वे अपना बचाव करते हुए कह रहे हैं कि छगनलाल ने अनाप-शनाप बकते हुए एससी एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करवाने की धमकी दी थी। उनका ये भी कहना है कि इसके बारे में एसपी को ज्ञापन देने के बाद छगनलाल ने मुकदमा दर्ज करवाया है, अत: पुलिस के जांच अधिकारी को समता मंच के खिलाफ दर्ज मुकदमे की निष्पक्षता का ध्यान रखना चाहिए। साफ है कि वे ये कह कर मुकदमे की हवा निकालना चाहते हैं कि वह झूठा है और एससी एसटी एक्ट का दुरुपयोग करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। कुल मिला कर बोर्ड कर्मचारी समता मंच व आरक्षण मंच के बैनरों पर आमने-सामने आ गए हैं। यह स्थिति पूरे देश में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले शिक्षा बोर्ड के लिए शर्मनाक हो गई है।
दूसरी ओर समता मंच के दबाव में मजबूरी में कर्मचारी संघ को एक तरफ रखने की परेशानी में आए बोर्ड अध्यक्ष डॉ. सुभाष गर्ग बोर्ड कर्मचारियों में उभरी नई गुटबाजी के कारण राहत में आ गए हैं। समता मंच के जिन कर्मचारियों के आगे उन्हें झुकना पड़ा था, उनका ही कानूनी पेंच में उलझना डॉ. गर्ग के लिए सुकून भरा माना जा सकता है। जाहिर तौर पर उन्हें अब दोनों गुटों के बीच तराजू रखने का मौका मिल गया है। इतना ही नहीं जिस कर्मचारी संघ को ताजा मसले पर उपेक्षा सहनी पड़ी थी वह भी अब मध्यस्थता करने की स्थिति में आ गया है। लब्बोलुआब एक बार फिर कूटनीति में माहिर डॉ. गर्ग को किस्मत से कूटनीतिक सफलता हाथ लगने जा रही है। इसके अतिरिक्त समता मंच के दबाव की वजह से डॉ. गर्ग व कर्मचारी संघ की ट्यूनिंग पर जो खतरा था, वह भी फिलहाल टलता नजर आ रहा है।