राजस्थान के पंचायतीराज व वक्फ राज्य मंत्री जनाब अमीन खां साहब ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को राजनीति में आगे बढऩे और एमएलए-एमपी बनने का गुर सिखाते हुए उदाहरण दिया है कि राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटील आपातकाल के दौरान भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीया श्रीमती इंदिरा गांधी के घर में रसोई बनाया करती थीं, इसी वफादारी का इनाम देने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने उन्हें राष्ट्रपति बनवा दिया। उन्होंने कार्यकर्ताओं को सिखाया कि आप भी श्रीमती पाटील की तरह नि:स्वार्थ भाव से सेवा करते रहें, देर से ही सही, कभी न कभी आपके पास फोन आ जाएगा कि आपको एमएलए या एमपी का चुनाव लडऩा है। अमीन खां ने पाली जिले के मानपुरा भाखरी स्थित जबदंबा माता मंदिर में जिला कांग्रेस की बैठक में यह सीख तब दी, जब कार्यकर्ताओं ने शिकायत की कि आलाकमान व कुछ पदाधिकारी उन्हें तवज्जो नहीं देते। उन्होंने यह तो नहीं सिखाया कि पार्टी के बैनर पर जनता की सेवा करते रहें, एक दिन जरूर उन्हें भी तवज्जो मिलेगी, बल्कि ये सिखाया कि चमचागिरी करते रहें, कभी तो लहर आएगी।
अगर राजनीति में आगे बढऩे का यही मूलमंत्र है तो सवाल ये उठता है कि अमीन साहब मंत्री पद तक कैसे पहुंचे हैं? क्या उन्होंने भी किसी बड़े नेता के घर सेवा-चाकरी की है? और की है तो कौन सी सेवा की है?
अमीन साहब ने एक ओर जहां गरिमापूर्ण राष्ट्रपति पद पर टिप्पणी करके मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी हैं, वहीं उस पद पर बैठीं श्रीमती पाटील की राजनीतिक यात्रा की पोल भी खोल दी है। गर ये सच भी है कि श्रीमती पाटील स्वर्गीया इंदिरा गांधी के यहां रसोई के काम में हाथ बंटाती थीं तो इसका ये मतलब कैसे निकाला जा सकता है कि वे उनके यहां रसोइये का काम करती थीं या चमचागिरी करने के लिए रसोई बनाती थीं। सवाल ये भी है कि क्या उन्होंने अमीन साहब की तरह यह जानते हुए सेवा की थी कि आगे जा कर ऊंचा पद मिलेगा और इसी कारण रसोई बनाती थीं?
अमीन साहब ने ऐसा बड़बोलपन करके न केवल राजनीतिक मर्यादाओं को ताक पर रख दिया है, अपितु राष्ट्रपति श्रीमती पाटील की योग्यता पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। उनके उदाहरण से तो ऐसा प्रतीत होता है कि श्रीमती पाटील में राजनीतिक योग्यता नाम की कोई चीज नहीं है, बल्कि वे केवल चाटुकारिता करते हुए ही इस पद पर पहुंची हैं। उदाहरण भले ही श्रीमती पाटील का दिया हो, मगर ऐसा कह कर उन्होंने राजनीतिक सफलता का नया फंडा ही स्थापित कर दिया है। साथ ही अन्य राजनेताओं की सफलता व योग्यता पर भी सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। जाहिर है जब वे कार्यकर्ताओं को राजनीति में आगे बढऩे के लिए यह गुर सिखा रहे हैं तो इसे उन्होंने श्रीमती पाटील से प्रेरणा लेकर खुद पर भी आजमाया होगा और उसी की बदौलत आज मंत्री पद पर हैं। होना तो यह चाहिए था कि वे कार्यकर्ताओं को वे अपने मंत्री बनने का राज भी बताते कि वे किस-किस की चाकरी करके आज इस मुकाम पर पहुंचे हैं। उन्होंने नहीं भी बताया है, तब भी यह तथ्य खुद-ब-खुद स्थापित हो गया है कि वे मंत्री पद तक कैसे पहुंचे हैं।
-गिरधर तेजवानी
बुधवार, 9 फ़रवरी 2011
सोमवार, 7 फ़रवरी 2011
सियापा कर खुद को लाचार मुख्यमंत्री साबित कर रहे हैं गहलोत
बीते रविवार को उन्होंने पेट्रोलियम पदार्थों में मिलावट की जांच व रोकथाम के लिए प्रदेशव्यापी अभियान की शुुरुआत करते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली की पोल खोलते हुए स्वयं ही स्वीकार कर लिया कि कोई एसएचओ किसी थाने का चार्ज लेने के सात-आठ दिन तक तो डंडा बजा कर काम करते हैं और उसके बाद उनकी सब सेटिंग हो जाती है। वे यह भी जानते हैं कि अपराधी कौन है और कहां छुपा हुआ है, फिर भी अपराधी पकड़ में नहीं आता। असल में वह तो शांत हो कर ड्यूटी टाइम में क्वार्टर में सो जाता है और बाकी काम हैड कॉन्सटेबल व सिपाही कर लेते हैं।
उनका यह बयान कदाचित काफी प्रतिशत तक सच हो सकता है, मगर एक मुख्यमंत्री का इस प्रकार बयान देना क्या यह साबित नहीं करता है कि वे भी उन एसएचओ की तरह ही तो हैं, जिसे सब कुछ पता होता है, फिर भी कुछ नहीं कर रहा। हालांकि इस प्रकार का बयान देने के बाद वे प्रशासनिक तंत्र को सुधारने के प्रति अपना संकल्प तो जाहिर करते हैं, मगर करते कुछ नहीं। गर कुछ करते भी हैं तो उसका परिणाम तो कहीं नजर नहीं आता। वरना क्या वजह है कि मुख्यमंत्री को सरकारी तंत्र की पोल तो पता है, मगर उसका आज तक इलाज नहीं हो पाया है। इससे साफ जाहिर होता है कि वे एक लाचार मुख्यमंत्री हैं और अपनी नाकामी खुद ही उजागर कर रहे हैं।
यह पहला मौका नहीं है कि गहलोत ने मुख्यमंत्री जैसे दायित्वपूर्ण ओहदे पर बैठ कर आम आदमी की तरह सियापा करते हुए जमीनी हकीकत बयां की हो। वे यह स्वीकार कर चुके हैं कि निजी अस्पताल लाश को भी वेंटीलेटर पर रख कर नोट कमाते हैं, पेंशन के लिए बाबू चक्कर लगवाते हैं, पुलिस ही शराब तस्करों को सूचना दे कर छापा मारती है और तस्कर भाग जाते हैं। उनकी सभी बातें सच ही प्रतीत होती हैं। भले ही पूरा तंत्र ऐसा न हो, मगर ऐसे उदाहरण हम आम जिंदगी में अपने आसपास देखते ही हैं। ऐसा नहीं कि वे ऐसी बातें करके प्रशासन को दुरुस्त करने की बात नहीं करते, जरूर करतें हैं, मगर नतीजा ढाक के तीन पात ही है। यह उनकी लाचारी के साथ असफलता का भी द्योतक है। कितनी अफसोसनाक बात है कि जो बात विपक्षी दल को शोभा देती है, वह वे सत्ता में बैठ कर कर रहे हैं। हालांकि उनका तर्क ये हो सकता है कि वे सच ही तो बयां कर रहे हैं और उनका खरा-खरा कहने का अंदाज भले ही लोगों को अच्छा लगता हो, मगर इससे वे प्रशासनिक तंत्र की नाकामी से अपने आप को अलग नहीं कर सकते। अपराध या नाकामी की स्वीकारोक्ति कभी नाकामी को डाइल्यूट नहीं कर देती। उसके लिए काम करके दिखाना होता है। उससे भी बड़ी बात यह है कि आपको मर्ज भी पता है, फिर भी उसका इलाज नहीं हो पा रहा तो जरूर आपकी कार्यप्रणाली में ही कहीं गड़बड़ है।
शुद्ध के लिए युद्ध अभियान को ही लें। इससे जाहिर तौर पर मिलावटियों में भय व्याप्त हुआ है, मगर इसका लाभ आम आदमी को जितना नहीं मिला, उससे ज्यादा मिलावट रोकने वाले तंत्र से जुड़े अधिकारियों को ही मिला है। इसकी वजह ये है कि वे अधिकारी सरकार के सख्त होने की दुहाही दे कर अपनी रेट बढ़ा रहे हैं। आरोप यहां तक है कि जब से यह अभियान शुरू हुआ है, खाद्य मंत्री इसका दुरुपयोग कर रहे हैं। अर्थात भले ही छोटे मिलावटियों पर शिकंजा कसा जा रहा हो, मगर बड़े मिलावटियों से तो सैटिंग ही हो रही है। मंत्री के बदनाम होने पर भी उसके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करने से उलटे गहलोत की ही छवि खराब हो रही है। ऐसा कैसे हो सकता है कि आपके मंत्रीमंडल के सदस्य तो बदनाम होते जाएं और उनके लीडर यानि आप खुद गांधीवादी कहलाते हुए अपने कुर्ते-पायजामे पर एक भी दाग न लगने दें।
रहा सवाल उनके ताजा बयान का, इससे एसएचओ सुधर जाएंगे, इसकी संभावना कम ही नजर आती है। उलटे पुलिस का मनोबल ही गिरेगा। पुलिस वाले कहेंगे कि जब एक मुख्यमंत्री ही हमें चोर ठहरा रहा है तो चोरी करने में हर्ज ही क्या है। कोई भी व्यक्ति केवल बदनामी से ही डरता है। अगर आप उसे बदनाम ही कर देंगे तो वह और निर्लज्ज हो जाएगा। एसएचओ पर आरोप लगाने की बजाय अगर वे ऐसे एसएचओ के खिलाफ सीधे कार्यवाही करते तो वह ज्यादा कारगर परिणाम देने वाला हो सकता था। अगर आप सख्ती बरतते हुए ऐसे एसएचओ के खिलाफ कार्यवाही करते तो दूसरे एसएचओ में भी खौफ कायम होता। और अगर इस प्रकार सार्वजनिक रूप से पूरी पुलिस जमात को ही जलील कर देंगे तो वह भले ही अनुशासन के कारण चुप रह जाएगी, मगर पिछले से पिछले चुनाव की तरह राज्य कर्मचारियों की तरह से आगामी चुनाव में भी सबक सिखा देगी।
-गिरधर तेजवानी
शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011
...इसलिए नहीं जुड़ रही युवा पीढ़ी संघ के संग
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की मौजूदगी में इन दिनों अजमेर में चल रही बैठकों में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि संगठन को मजबूत करने के लिए अधिकाधिक युवाओं को जोड़ा जाए और शाखाओं का विस्तार किया जाए। वजह साफ है कि पिछले कुछ वर्षों से संघ के प्रति आकर्षण कम होने से संघ की शाखाओं में युवाओं की संख्या कम होने से शिथिलता आती जा रही है, जो कि सांप्रदायिकता के आरोप से कहीं ज्यादा चिंताजनक है।
वस्तुत: संघ के प्रति युवकों के आकर्षण कम होने का सिलसिला हाल ही में शुरू नहीं हुआ है अथवा अचानक कोई कारण नहीं उत्पन्न हुआ है, जो कि आकर्षण कम होने के लिए उत्तरदायी हो। पिछले करीब 15 साल के दरम्यान संघ की शाखाओं में युवाओं की संख्या में गिरावट महसूस की गई है। यह गिरावट इस कारण भी संघ के नीति निर्धारकों को ज्यादा महसूस होती है, क्योंकि जितनी तेजी से जनसंख्या में वृद्धि हुई है, उसी अनुपात में युवा जुड़ नहीं पाया है। भले ही यह सही हो कि जो स्वयंसेवक आज से 10-15 साल पहले अथवा उससे भी पहले जुड़ा, वह टूटा नहीं है, लेकिन नया युवा उतने उत्साह के साथ नहीं जुड़ रहा, जिस प्रकार पहले जुड़ा करता था। इसके अनेक कारण हैं।
मोटे तौर पर देखा जाए तो इसकी मुख्य वजह है टीवी और संचार माध्यमों का विस्तार, जिसकी वजह से पाश्चात्य संस्कृति का हमला बढ़ता ही जा रहा है। यौवन की दहलीज पर पैर रखने वाली हमारी पीढ़ी उसके ग्लैमर से सर्वाधिक प्रभावित है। गांव कस्बे की ओर, कस्बे शहर की तरफ और शहर महानगर की दिशा में बढ़ रहे हैं। सच तो यह है कि भौतिकतावादी और उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण शहरी स्वच्छंदता गांवों में भी प्रवेश करने लगी है। युवा पीढ़ी का खाना-पीना व रहन-सहन तेजी से बदल रहा है। बदलाव की बयार में बह रहे युवाओं को किसी भी दृष्टि से संघ की संस्कृति अपने अनुकूल नहीं नजर आती। संघ के स्वयंसेवकों में आपस का जो लोक व्यवहार है, वह किसी भी युवा को आम जिंदगी में कहीं नजर नहीं आता। व्यवहार तो दूर की बात है, संघ का अकेला डे्रस कोड ही युवकों को दूर किए दे रहा है।
जब से संघ की स्थापना हुई है, तब से लेकर अब तक समय बदलने के साथ डे्रस कोड में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। सच्चाई तो ये है कि चौड़े पांयचे वाली हाफ पैंट ही मजाक की कारक बन गई है। यह कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि अपने आप को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी मानने वालों के प्रति आम लोगों में श्रद्धा की बजाय उपहास का भाव है और वे स्वयंसेवकों को चड्ढा कह कर संबोधित करते हैं। स्वयं सेवकों को भले ही यह सिखाया जाता हो कि वे संघ की डे्रस पहन कर और हाथ में दंड लेकर गर्व के साथ गलियों से गुजरें, लेकिन स्वयं सेवक ही जानता है कि वह हंसी का पात्र बन कर कैसा महसूस करता है। हालत ये है कि संघ के ही सियासी चेहरे भाजपा से जुड़े नेता तक संघ के कार्यक्रम में हाफ पैंट पहन कर जाने में अटपटा महसूस करते हैं, लेकिन अपने नंबर बढ़ाने की गरज से मजबूरी में हाफ पैंट पहनते हैं। हालांकि कुछ वर्ष पहले संघ में ड्रेस कोड में कुछ बदलाव करने पर चर्चा हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोर गु्रप ने ऐसा करने का साहस नहीं जुटाया है। उसे डर है कि कहीं ऐसा करने से स्वयंसेवक की पहचान न खो जाए। ऐसा नहीं है कि डे्रस कोड की वजह से दूर होती युवा पीढ़ी की समस्या से केवल संघ ही जूझ रहा है, कांग्रेस का अग्रिम संगठन सेवादल तक परेशान है। वहां भी ड्रेस कोड बदलने पर चर्चा हो चुकी है।
जहां तक संघ पर सांप्रदायिक आरोप होने का सवाल है, उसकी वजह से भी युवा पीढ़ी को संघ में जाने में झिझक महसूस होती है, चूंकि व्यवहार में धर्मनिरपेक्षता का माहौल ज्यादा बन गया है। भले ही भावनाओं के ज्वार में हिंदू-मुस्लिम दंगे होने के कारण ऐसा प्रतीत होता हो कि दोनों संप्रदाय एक दूसरे के विपरीत हैं, लेकिन व्यवहार में हर हिंदू व मुसलमान आपस में प्रेम से घुल-मिल कर ही रहना चाहता है। देश भले ही धार्मिक कट्टरवाद की घटनाओं से पीडि़त हो, मगर आम जनजीवन में कट्टरवाद पूरी तरह अप्रासंगिक है। युवकों को इस बात का भी डर रहता है कि यदि उन पर सांप्रदायिक संगठन से जुड़े होने का आरोप लगा तो उनका कैरियर प्रभावित होगा। आज बढ़ती बेरोजगारी के युग में युवकों को ज्यादा चिंता रोजगार की है, न कि हिंदू राष्ट के लक्ष्य को हासिल करने की और न ही राष्ट्रवाद और राष्ट्र की। असल में राष्ट्रीयता की भावना और जीवन मूल्य जितनी तेजी से गिरे हैं, वह भी एक बड़ा कारण हैं। युवा पीढ़ी को लगता है कि संघ में सिखाए जाने वाले जीवन मूल्य कहने मात्र को तो अच्छे नजर आते हैं, जब कि व्यवहार में भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है। सुखी वह नजर आता जो कि शिष्टाचार बन चुके भ्रष्टाचार पर चल रहा है, ईमानदार तो कष्ट ही कष्ट ही झेलता है।
जरा, राजनीति के पहलु को भी देख लें। जब तक संघ के राजनीतिक मुखौटे भाजपा से जुड़े लोगों ने सत्ता नहीं भोगी थी, तब तक उन्हें सत्ता के साथ आने वाले अवगुण छू तक नहीं पाए थे, लेकिन जैसे ही सत्ता का स्वाद चख लिया, उनके चरित्र में ही बदलाव आ गया है। इसकी वजह से संघ व भाजपा में ही दूरियां बनने लगी हैं। संघर्षपूर्ण व यायावर जिंदगी जीने वाले संघ के प्रचारकों को भाजपा के नेताओं से ईष्र्या होती है। हिंदूवादी मानसिकता वाले युवा, जो कि राजनीति में आना चाहते हैं, वे संघ से केवल इस कारण थोड़ी नजदीकी रखते हैं, ताकि उन्हें चुनाव के वक्त टिकट आसानी से मिल जाए। बाकी संघ की संस्कृति से उनका दूर-दूर तक वास्ता नहीं होता। अनेक भाजपा नेता अपना वजूद बनाए रखने के लिए संघ के प्रचारकों की सेवा-चाकरी करते हैं। कुछ भाजपा नेताओं की केवल इसी कारण चलती है, क्योंकि उन पर किसी संघ प्रचारक व महानगर प्रमुख का आशीर्वाद बना हुआ है। प्रचारकों की सेवा-चाकरी का परिणाम ये है कि प्रचारकों में ही भाजपा नेताओं के प्रति मतभेद हो गए हैं। संघ व पार्टी की आर्थिक बेगारियां झेलने वाले भाजपा नेता दिखाने भर को प्रचारक को सम्मान देते हैं, लेकिन टिकट व पद हासिल करते समय अपने योगदान को गिना देते हैं। भीतर ही भीतर यह माहौल संघ के नए-नए स्वयंसेवक को खिन्न कर देता है। जब स्वयं स्वयंसेवक ही कुंठित होगा तो वह और नए युवाओं को संघ में लाने में क्यों रुचि लेगा। ऐसा नहीं है कि संघ के कर्ताधर्ता इन हालात से वाकिफ न हों, मगर समस्या इतनी बढ़ गई है कि अब इससे निजात कठिन ही प्रतीत होता है।
एक और अदृश्य सी समस्या है, महिलाओं की आधी दुनिया से संघ की दूरी। भले ही संघ के अनेक प्रकल्पों से महिलाएं जुड़ी हुई हों, मगर मूल संगठन में उन्हें कोई स्थान नहीं है। इस लिहाज से संघ को यदि पुरुष प्रधान कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। संघ ने महिलाओं की भी शाखाएं गठित करने पर कभी विचार नहीं किया। आज जब कि महिला सशक्तिकरण पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, महिलाएं हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं, संघ का महिलाओं को न जोडऩे की वजह से संघ उतना मजबूत नहीं हो पा रहा, जितना कि होना चाहिए।
बहरहाल, देखना ये है कि देश के बदलते हालात में भगवा आतंकवाद के आरोप से तिलमिलाया संघ शाखाओं के विस्तार व युवा स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ाने के लिए क्या कारगर उपाय करता है।
वस्तुत: संघ के प्रति युवकों के आकर्षण कम होने का सिलसिला हाल ही में शुरू नहीं हुआ है अथवा अचानक कोई कारण नहीं उत्पन्न हुआ है, जो कि आकर्षण कम होने के लिए उत्तरदायी हो। पिछले करीब 15 साल के दरम्यान संघ की शाखाओं में युवाओं की संख्या में गिरावट महसूस की गई है। यह गिरावट इस कारण भी संघ के नीति निर्धारकों को ज्यादा महसूस होती है, क्योंकि जितनी तेजी से जनसंख्या में वृद्धि हुई है, उसी अनुपात में युवा जुड़ नहीं पाया है। भले ही यह सही हो कि जो स्वयंसेवक आज से 10-15 साल पहले अथवा उससे भी पहले जुड़ा, वह टूटा नहीं है, लेकिन नया युवा उतने उत्साह के साथ नहीं जुड़ रहा, जिस प्रकार पहले जुड़ा करता था। इसके अनेक कारण हैं।
मोटे तौर पर देखा जाए तो इसकी मुख्य वजह है टीवी और संचार माध्यमों का विस्तार, जिसकी वजह से पाश्चात्य संस्कृति का हमला बढ़ता ही जा रहा है। यौवन की दहलीज पर पैर रखने वाली हमारी पीढ़ी उसके ग्लैमर से सर्वाधिक प्रभावित है। गांव कस्बे की ओर, कस्बे शहर की तरफ और शहर महानगर की दिशा में बढ़ रहे हैं। सच तो यह है कि भौतिकतावादी और उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण शहरी स्वच्छंदता गांवों में भी प्रवेश करने लगी है। युवा पीढ़ी का खाना-पीना व रहन-सहन तेजी से बदल रहा है। बदलाव की बयार में बह रहे युवाओं को किसी भी दृष्टि से संघ की संस्कृति अपने अनुकूल नहीं नजर आती। संघ के स्वयंसेवकों में आपस का जो लोक व्यवहार है, वह किसी भी युवा को आम जिंदगी में कहीं नजर नहीं आता। व्यवहार तो दूर की बात है, संघ का अकेला डे्रस कोड ही युवकों को दूर किए दे रहा है।
जब से संघ की स्थापना हुई है, तब से लेकर अब तक समय बदलने के साथ डे्रस कोड में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। सच्चाई तो ये है कि चौड़े पांयचे वाली हाफ पैंट ही मजाक की कारक बन गई है। यह कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि अपने आप को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी मानने वालों के प्रति आम लोगों में श्रद्धा की बजाय उपहास का भाव है और वे स्वयंसेवकों को चड्ढा कह कर संबोधित करते हैं। स्वयं सेवकों को भले ही यह सिखाया जाता हो कि वे संघ की डे्रस पहन कर और हाथ में दंड लेकर गर्व के साथ गलियों से गुजरें, लेकिन स्वयं सेवक ही जानता है कि वह हंसी का पात्र बन कर कैसा महसूस करता है। हालत ये है कि संघ के ही सियासी चेहरे भाजपा से जुड़े नेता तक संघ के कार्यक्रम में हाफ पैंट पहन कर जाने में अटपटा महसूस करते हैं, लेकिन अपने नंबर बढ़ाने की गरज से मजबूरी में हाफ पैंट पहनते हैं। हालांकि कुछ वर्ष पहले संघ में ड्रेस कोड में कुछ बदलाव करने पर चर्चा हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोर गु्रप ने ऐसा करने का साहस नहीं जुटाया है। उसे डर है कि कहीं ऐसा करने से स्वयंसेवक की पहचान न खो जाए। ऐसा नहीं है कि डे्रस कोड की वजह से दूर होती युवा पीढ़ी की समस्या से केवल संघ ही जूझ रहा है, कांग्रेस का अग्रिम संगठन सेवादल तक परेशान है। वहां भी ड्रेस कोड बदलने पर चर्चा हो चुकी है।
जहां तक संघ पर सांप्रदायिक आरोप होने का सवाल है, उसकी वजह से भी युवा पीढ़ी को संघ में जाने में झिझक महसूस होती है, चूंकि व्यवहार में धर्मनिरपेक्षता का माहौल ज्यादा बन गया है। भले ही भावनाओं के ज्वार में हिंदू-मुस्लिम दंगे होने के कारण ऐसा प्रतीत होता हो कि दोनों संप्रदाय एक दूसरे के विपरीत हैं, लेकिन व्यवहार में हर हिंदू व मुसलमान आपस में प्रेम से घुल-मिल कर ही रहना चाहता है। देश भले ही धार्मिक कट्टरवाद की घटनाओं से पीडि़त हो, मगर आम जनजीवन में कट्टरवाद पूरी तरह अप्रासंगिक है। युवकों को इस बात का भी डर रहता है कि यदि उन पर सांप्रदायिक संगठन से जुड़े होने का आरोप लगा तो उनका कैरियर प्रभावित होगा। आज बढ़ती बेरोजगारी के युग में युवकों को ज्यादा चिंता रोजगार की है, न कि हिंदू राष्ट के लक्ष्य को हासिल करने की और न ही राष्ट्रवाद और राष्ट्र की। असल में राष्ट्रीयता की भावना और जीवन मूल्य जितनी तेजी से गिरे हैं, वह भी एक बड़ा कारण हैं। युवा पीढ़ी को लगता है कि संघ में सिखाए जाने वाले जीवन मूल्य कहने मात्र को तो अच्छे नजर आते हैं, जब कि व्यवहार में भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है। सुखी वह नजर आता जो कि शिष्टाचार बन चुके भ्रष्टाचार पर चल रहा है, ईमानदार तो कष्ट ही कष्ट ही झेलता है।
जरा, राजनीति के पहलु को भी देख लें। जब तक संघ के राजनीतिक मुखौटे भाजपा से जुड़े लोगों ने सत्ता नहीं भोगी थी, तब तक उन्हें सत्ता के साथ आने वाले अवगुण छू तक नहीं पाए थे, लेकिन जैसे ही सत्ता का स्वाद चख लिया, उनके चरित्र में ही बदलाव आ गया है। इसकी वजह से संघ व भाजपा में ही दूरियां बनने लगी हैं। संघर्षपूर्ण व यायावर जिंदगी जीने वाले संघ के प्रचारकों को भाजपा के नेताओं से ईष्र्या होती है। हिंदूवादी मानसिकता वाले युवा, जो कि राजनीति में आना चाहते हैं, वे संघ से केवल इस कारण थोड़ी नजदीकी रखते हैं, ताकि उन्हें चुनाव के वक्त टिकट आसानी से मिल जाए। बाकी संघ की संस्कृति से उनका दूर-दूर तक वास्ता नहीं होता। अनेक भाजपा नेता अपना वजूद बनाए रखने के लिए संघ के प्रचारकों की सेवा-चाकरी करते हैं। कुछ भाजपा नेताओं की केवल इसी कारण चलती है, क्योंकि उन पर किसी संघ प्रचारक व महानगर प्रमुख का आशीर्वाद बना हुआ है। प्रचारकों की सेवा-चाकरी का परिणाम ये है कि प्रचारकों में ही भाजपा नेताओं के प्रति मतभेद हो गए हैं। संघ व पार्टी की आर्थिक बेगारियां झेलने वाले भाजपा नेता दिखाने भर को प्रचारक को सम्मान देते हैं, लेकिन टिकट व पद हासिल करते समय अपने योगदान को गिना देते हैं। भीतर ही भीतर यह माहौल संघ के नए-नए स्वयंसेवक को खिन्न कर देता है। जब स्वयं स्वयंसेवक ही कुंठित होगा तो वह और नए युवाओं को संघ में लाने में क्यों रुचि लेगा। ऐसा नहीं है कि संघ के कर्ताधर्ता इन हालात से वाकिफ न हों, मगर समस्या इतनी बढ़ गई है कि अब इससे निजात कठिन ही प्रतीत होता है।
एक और अदृश्य सी समस्या है, महिलाओं की आधी दुनिया से संघ की दूरी। भले ही संघ के अनेक प्रकल्पों से महिलाएं जुड़ी हुई हों, मगर मूल संगठन में उन्हें कोई स्थान नहीं है। इस लिहाज से संघ को यदि पुरुष प्रधान कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। संघ ने महिलाओं की भी शाखाएं गठित करने पर कभी विचार नहीं किया। आज जब कि महिला सशक्तिकरण पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, महिलाएं हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं, संघ का महिलाओं को न जोडऩे की वजह से संघ उतना मजबूत नहीं हो पा रहा, जितना कि होना चाहिए।
बहरहाल, देखना ये है कि देश के बदलते हालात में भगवा आतंकवाद के आरोप से तिलमिलाया संघ शाखाओं के विस्तार व युवा स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ाने के लिए क्या कारगर उपाय करता है।
गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011
दिये हुए संभलते नहीं, नए विभाग मिलने की बात करते हैं भरत सिंह
महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम की दुहाई दे कर सत्ता के विकेन्द्रीकरण और ग्राम स्वराज के नारे देने वाली प्रदेश की कांग्रेस सरकार से एक ओर तो पंचायतीराज को दिए गए पांच विभाग तो संभलते नहीं, दूसरी ओर उनके पंचायतीराज मंत्री भरतसिंह पंचायतीराज को और विभाग मिलने की बात करने लगे हैं। ऐसा लगता है कि विवाद खड़े करना और विरोधाभासी बयान जारी करना उनकी आदत में शुमार है। सोमवार को जब वे अजमेर में अपने विभाग की संभागीय बैठक में भाग लेने आए, तो उन्हें फिर से जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों के बीच अधिकारों को लेकर चल रही खींचतान का सामना करना पड़ा। जनप्रतिनिधियों ने शिकायत की कि अधिकारी उनका कहा नहीं मानते और अधिकारियों ने सवाल खड़ा किया कि वे सरकार की मानें या जनप्रतिनिधियों की। इसके बावजूद वे यह कह गए कि व्यवस्थाएं ठीक चलती रहीं तो पंचायतीराज को और विभाग दिए जाएंगे।
असल में वस्तुस्थिति ये है कि पंचायतीराज को लेकर खुद सरकार के ही दो मंत्री आपस में एकमत नहीं हैं। जनप्रतिनिधियों और सीईओ के बीच अधिकारों को लेकर बनी मंत्रीमंडलीय समिति ने अपनी रिपोर्ट अभी दी ही नहीं है, इसके बावजूद पिछले दिनों शिक्षामंत्री मास्टर भंवरलाल व पंचायती राज मंत्री भरत सिंह परस्पर विरोधी बयान दे गए। मास्टर भंवरलाल ने अजमेर में शिक्षा विभाग की संभागीय बैठक में अधिकारियों को उनके अधिकारों के प्रति उकसाते हुए साफ तौर पर कहा कि वे जनप्रतिनिधियों से घबराएं नहीं और केवल उन्हें बताए नियमानुसार ही काम करें। पंचायतीराज के जनप्रतिनिधि सरकार की ओर से तय सीमा तक ही अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। अजमेर के संदर्भ में बात करे तों उन्होंने साफ तौर पर शिल्पा को शह देते हुए कहा कि वे किसी के दबाव में न आएं और वही करें, जो कि नियमानुसार सही हो। दूसरी ओर पंचायतराज मंत्री भरतसिंह ने यह कह कर जनप्रतिनिधियों की पैरवी की कि जिला प्रमख के नेतृत्व में बनी स्थाई समिति को असीमित अधिकार हैं और उसके निर्णयों को अमल में लाना अधिकारियों की जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी खुले रूप में स्वीकार किया कि संभाग स्तर पर जिन जिला परिषदों में आईएएस अधिकारियों को मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया गया है, वहां सबसे ज्यादा परेशानियां बढ़ी हैं। इससे बड़ी क्या विडंबना होगी कि सरकार के ही दो मंत्री दोनों पक्षों के बीच टकराव की नौबत ला दी। भरत सिंह की बयानबाजी पर तो बाकायदा विवाद भी हो गया। जिला सरपंच संघ के अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह ने न केवल उनके बयान का विरोध किया, अपितु मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के फैसलों पर अगूंली न उठाने का आग्रह करते हुए एक अर्थ में सीधे गहलोत से ही भिड़ा दिया था।
बहरहाल, दो मंत्रियों के इस प्रकार आमने-सामने और धरातल पर भी अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के बीच नहीं थम रहे टकराव इसी से स्पष्ट हो गया था कि सरकार ने बिना सोचे-समझे जिला परिषदों में आईएएस को सीईओ बनाने का निर्णय किया। एक ओर उसने पंचायतीराज संस्थाओं को मजबूत करने के मकसद से उनके अधीन पांच महकमे किए और साथ ही जनप्रतिनिधि निरंकुश न हो जाएं, इसके लिए संभाग मुख्यालयों की जिला परिषदों में आईएएस अधिकारी बैठा दिए। इससे टकराव की नौबत आ गई। वस्तुत: उसने एक प्रयोग किया और वह फेल हो गया। जनप्रतिनिधियों व आईएएस में टकराव हुआ और अब सरकार परेशान है कि आखिर इसका तोड़ क्या निकाला जाए। ऐसे में भरतसिंह का यह बयान कितना हास्यास्पद है कि पंचायतीराज को और विभाग दिए जाएंगे।
असल में वस्तुस्थिति ये है कि पंचायतीराज को लेकर खुद सरकार के ही दो मंत्री आपस में एकमत नहीं हैं। जनप्रतिनिधियों और सीईओ के बीच अधिकारों को लेकर बनी मंत्रीमंडलीय समिति ने अपनी रिपोर्ट अभी दी ही नहीं है, इसके बावजूद पिछले दिनों शिक्षामंत्री मास्टर भंवरलाल व पंचायती राज मंत्री भरत सिंह परस्पर विरोधी बयान दे गए। मास्टर भंवरलाल ने अजमेर में शिक्षा विभाग की संभागीय बैठक में अधिकारियों को उनके अधिकारों के प्रति उकसाते हुए साफ तौर पर कहा कि वे जनप्रतिनिधियों से घबराएं नहीं और केवल उन्हें बताए नियमानुसार ही काम करें। पंचायतीराज के जनप्रतिनिधि सरकार की ओर से तय सीमा तक ही अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। अजमेर के संदर्भ में बात करे तों उन्होंने साफ तौर पर शिल्पा को शह देते हुए कहा कि वे किसी के दबाव में न आएं और वही करें, जो कि नियमानुसार सही हो। दूसरी ओर पंचायतराज मंत्री भरतसिंह ने यह कह कर जनप्रतिनिधियों की पैरवी की कि जिला प्रमख के नेतृत्व में बनी स्थाई समिति को असीमित अधिकार हैं और उसके निर्णयों को अमल में लाना अधिकारियों की जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी खुले रूप में स्वीकार किया कि संभाग स्तर पर जिन जिला परिषदों में आईएएस अधिकारियों को मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया गया है, वहां सबसे ज्यादा परेशानियां बढ़ी हैं। इससे बड़ी क्या विडंबना होगी कि सरकार के ही दो मंत्री दोनों पक्षों के बीच टकराव की नौबत ला दी। भरत सिंह की बयानबाजी पर तो बाकायदा विवाद भी हो गया। जिला सरपंच संघ के अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह ने न केवल उनके बयान का विरोध किया, अपितु मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के फैसलों पर अगूंली न उठाने का आग्रह करते हुए एक अर्थ में सीधे गहलोत से ही भिड़ा दिया था।
बहरहाल, दो मंत्रियों के इस प्रकार आमने-सामने और धरातल पर भी अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के बीच नहीं थम रहे टकराव इसी से स्पष्ट हो गया था कि सरकार ने बिना सोचे-समझे जिला परिषदों में आईएएस को सीईओ बनाने का निर्णय किया। एक ओर उसने पंचायतीराज संस्थाओं को मजबूत करने के मकसद से उनके अधीन पांच महकमे किए और साथ ही जनप्रतिनिधि निरंकुश न हो जाएं, इसके लिए संभाग मुख्यालयों की जिला परिषदों में आईएएस अधिकारी बैठा दिए। इससे टकराव की नौबत आ गई। वस्तुत: उसने एक प्रयोग किया और वह फेल हो गया। जनप्रतिनिधियों व आईएएस में टकराव हुआ और अब सरकार परेशान है कि आखिर इसका तोड़ क्या निकाला जाए। ऐसे में भरतसिंह का यह बयान कितना हास्यास्पद है कि पंचायतीराज को और विभाग दिए जाएंगे।
मोहन भागवत जी, क्या आप दरगाह जियारत करेंगे?
परम आदरणीय श्री मोहन भागवत जी,
इन दिनों ऐतिहासिक अजमेर शहर देश के सबसे बड़े विपक्षी दल भाजपा की च्आत्माज् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख के नाते आपकी गरिमामय मौजूदगी का गवाह बन रहा है। दुनिया भर को सांप्रदायिक सौहाद्र्र का संदेश देने वाला यह शहर इस बात का भी गवाह रहा है कि राजा हो या रंक, हर कोई दोनों अंतर्राष्ट्रीय धर्मस्थलों तीर्थराज पुष्कर व दरगाह ख्वाजा साहब में हाजिरी जरूर देता है। ऐसे में आमजन में यह सवाल कुलबुला रहा है कि क्या आप भी इन स्थलों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करेंगे। जहां तक पुष्कर का सवाल है, अगर वहां जाते हैं तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा, या यूं कहिए कि उसमें कुछ भी असहज नहीं लगेगा, क्योंकि आप हिंदूवादी संगठन के अगुवा हैं, मगर क्या दरगाह जाएंगे, यह सवाल जरूर तनिक चौंकाने वाला हो सकता है। यह कदाचित संघ से जुड़े लोगों की मन:स्थिति को कुछ असहज भी कर सकता है कि कैसा बेहूदा सवाल उठाया जा रहा है? मगर सवाल तो सवाल है। अनुकूल जमीन पर हवा, पानी, धूप मिलते ही खुद-ब-खुद उगता है। बस फर्क सिर्फ उसे दबा देने अथवा उजागर करने का है।
वस्तुत: आप देश के सबसे बड़े हिंदूवादी व राष्ट्रवादी संगठन के शीर्षस्थ नेता हैं। देश के एक प्रमुख सत्ता केन्द्र हैं। इन दिनों चूंकि दरगाह बम ब्लास्ट में कुछ संघनिष्ठों के शामिल होने के आरोप लग रहे हैं और संघ इस वजह से लगाए जा रहे भगवा आतंकवाद के आरोप को सिरे से नकार रहा है, अत: यह सवाल बिलकुल सहज और प्रासंगिक है। यह इसलिए भी स्वाभाविक है कि बम ब्लास्ट मामले में संघ के प्रमुख पदाधिकारी इन्द्रेश कुमार भी आरोप के घेरे में आए तो संघ और भाजपा ने कड़ा ऐतराज किया। राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने तो इन्द्रेश कुमार का बचाव करते हुए यहां तक कहा कि सरकार उन्हें झूठा फंसाने का षड्यंत्र रच रही है। यह एक ऐसे व्यक्तित्व को बदनाम करने की साजिश है, जिसने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के माध्यम से सभी मजहबों में भाईचारा कायम करने के लिए सेतु का काम किया है। जाहिर है संघ केवल कथनी में ही नहीं, अपितु करनी में भी इन्द्रेश कुमार के माध्यम से राष्ट्रवादी मुस्लिमों को अपने करीब करने में जुटा हुआ है। कुछ मुस्लिम जुड़े भी हैं। वैसे भी संघ की अवधारणा है कि हिंदू कोई धर्म नहीं, अपितु एक संस्कृति है, जीवन पद्धति है, जिसमें यहां पल रहे सभी धर्मावलम्बी शामिल हैं।
इसी संदर्भ में संघ के ही एक प्रमुख विचारक के विचार देखिए। उन्होंने लिखा है कि आजादी से पूर्व संघ के संस्थापक डॉ0 केशवराव बलिराम हेडगेवार की सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि इस देश का सबसे प्राचीन समाज यानि हिन्दू समाज राष्ट्रीय स्वाभिमान से शून्य प्राय: आत्म विस्मृति में डूबा था। इसी परिप्रेक्ष्य में संघ का उद्देश्य हिन्दू संगठन यानि इस देश के प्राचीन समाज में राष्ट्रीय स्वाभिमान, नि:स्वार्थ भावना व एकजुटता का भाव निर्माण करना बना। यहां यह स्पष्ट कर देना उचित ही है कि डॉ. हेडगेवार का यह विचार सकारात्मक सोच का परिणाम था। किसी के विरोध में या किसी क्षणिक विषय की प्रतिक्रिया में से यह कार्य नहीं खड़ा हुआ। अत: इस कार्य को मुस्लिम विरोधी या ईसाई विरोधी कहना संगठन की मूल भावना के ही विरुद्ध हो जायेगा। हिन्दू संगठन शब्द सुनकर जिनके मन में इस प्रकार के पूर्वाग्रह बन गये हैं, उनके लिए संघ को समझना कठिन ही होगा। हिन्दू के मूल स्वभाव उदारता व सहिष्णुता के कारण दुनिया के सभी मत-पंथों को भारत में प्रवेश व प्रश्रय मिला। भारत में अनेक मत-पंथों के लोग रहने लगे। भारत में सभी पंथों का सहज रहना यहां के प्राचीन समाज (हिन्दू) के स्वभाव के कारण है। उस हिन्दुत्व के कारण है जिसे देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी जीवन पद्धति कहा है, केवल पूजा पद्धति नहीं। संघ की प्रार्थना में प्रार्थना में मातृभूमि की वंदना, प्रभु का आशीर्वाद, संगठन के कार्य के लिए गुण, राष्ट्र के परम वैभव (सुख, शांति, समृद्धि) की कल्पना की गई है। प्रार्थना में हिन्दुओं का परम वैभव नहीं कहा है, राष्ट्र का परम वैभव कहा है।
उन महाशय के ये विचार जाहिर करते हैं कि संघ मुसलमानों को अपने से अलग करके नहीं मान रहा, भले ही उनकी पूजा पद्धति भिन्न है। आज जब कि इसी पूजा पद्धति की बिना पर कांग्रेस संघ को मुस्लिमों के विरुद्ध खड़ा माना रही है, आपके समक्ष यह चुनौती है कि आप अजमेर की सरजमीं से यह संदेश दें कि उसके आरोप निराधार हैं। कि संघ मुस्लिमों अथवा उनके धर्मस्थलों के प्रति घृणा का भाव नहीं रखता। विशेष रूप से सूफी मत की इस कदीमी दरगाह के प्रति, जो कट्टरवादी इस्लाम से अलग हट कर सभी धर्मों में भाईचारे का संदेश दे रही है।
यदि आपके दरगाह जियारत करने के सवाल को बेहूदा माना जाता है तो इसकी क्या वजह है कि दरगाह में जियारत को आने वालों में मुसलमानों की तुलना में हिंदू ही अधिक होते हैं? क्या उन्हें पता नहीं है कि उन्हें यहां सिर नहीं झुकाना चाहिए।
इसी सिलसिले में बम विस्फोट के आरोप में गिरफ्तार असीमानंद के उस इकबालिया बयान पर गौर कीजिए कि बम विस्फोट किया ही इस मकसद से गया था कि दरगाह में हिंदुओं को जाने से रोका जाए। दरगाह बम विस्फोट की बात छोड़ भी दें तो आज तक किसी भी हिंदू संगठन ने ऐसे कोई निर्देश जारी करने की हिमाकत नहीं की है कि हिंदू दरगाह में नहीं जाएं। वे जानते हैं कि उनके कहने को कोई हिंदू मानने वाला नहीं है। वजह साफ है। चाहे हिंदू ये कहें कि ईश्वर एक ही है, मगर उनकी आस्था छत्तीस करोड़ देवी-देवताओं में भी है। बहुईश्वरवाद के कारण ही हिंदू धर्म लचीला है। और इसी वजह से हिंदू धर्मावलम्बी कट्टरवादी नहीं हैं। उन्हें शिवजी, हनुमानजी और देवीमाता के आगे सिर झुकाने के साथ पीर-फकीरों की मजरों पर भी मत्था टेकने में कुछ गलत नजर नहीं आता। रहा सवाल मुस्लिमों का तो वह खड़ा ही बुत परस्ती के खिलाफ है। ऐसे में भला हिंदू कट्टरपंथियों का यह तर्क कहां ठहरता है कि अगर हिंदू मजारों पर हाजिरी देता है तो मुस्लिमों को भी मंदिर में दर्शन करने को जाना चाहिए। सीधी-सीधी बात है मुस्लिम अपने धर्म का पालन करते हुए हिंदू धर्मस्थलों पर नहीं जाता, जब कि हिंदू इसी कारण मुस्लिम धर्म स्थलों पर चला जाता है, क्यों कि उसके धर्म विधान में देवी-देवता अथवा पीर-फकीर को नहीं मानने की कोई हिदायत नहीं है।
बहरहाल, आज जब कि संघ मुस्लिम विरोधी और भगवा आतंकवाद के आरोप से मुक्त होने को तत्पर है, भले ही वह घर-घर जा कर खुलासा करे, मगर संघ प्रमुख होने के नाते आपके लिए यह विचारणीय है कि अजमेर में अपनी मौजूदगी का लाभ उठाएंगे या नहीं? क्या दरगाह जियारत करके अथवा दरगाह में सिर्फ औपचारिकता मात्र के लिए श्रद्धा सुमन अर्पित करके कोई उदाहरण पेश करेंगे? क्या भाजपा से जुड़े मुस्लिमों व खादिमों अपनी जमात में गर्व से सिर उठाने का मौका देंगे? या फिर इस सवाल को अनुत्तरित ही छोड़ देंगे?
-गिरधर तेजवानी
मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011
कांग्रेस को हमला करने का मौका ही क्यों दिया संघ ने?

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ चालक प्रमुख मोहन भागवत इन दिनों अजमेर प्रवास पर हैं। वे यहां पांच दिन तक संघ के विभिन्न पदाधिकारियों व स्वयंसेवकों के साथ वैचारिक मंथन करेंगे। जाहिर है कांग्रेस की ओर से बहुप्रचारित शब्द च्भगवा आतंकवादज् पर भी यहां चर्चा होगी और उससे मुक्त होने पर भी गहन विचार होगा। तीर्थराज पुष्कर व दरगाह ख्वाजा साहब को अपने आंचल में समेटे इस पावन धरा से, जो कि पूरे विश्व में सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश देती है, संघ को भी ऐसे ही सद्भाव का संदेश देने का यह सुअवसर है। विशेष रूप से इस वजह से भी, क्योंकि कथित रूप से संघ पृष्ठभूमि के कुछ अतिवादियों की ओर से दरगाह में विस्फोट को अंजाम दिए जाने के कारण अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त यह शहर कुछ और संवेदनशील हो गया है। जाहिर तौर पर पूरे देश की नजर इन दिनों अजमेर पर रहेगी, क्योंकि यहां से दिए गए संदेश की गूंज देशभर में दूर-दूर तक सुनाई देगी।
यह सही है कि कांग्रेस ने हैदराबाद की मक्का मस्जिद और मालेगांव में हुए विस्फोटों से ही भगवा आतंकवाद की रट शुरू कर दी थी, मगर करोड़ों मुसलमानों के साथ हिंदुओं के भी आस्था केन्द्र दरगाह में विस्फोट के बाद कांग्रेस को, संघ को और ज्यादा घेरने का मौका मिल गया। परिणामस्वरूप बचाव में भागवत सहित संघ व भाजपा के सभी नेताओं को एक स्वर से यह कहना पड़ा कि संघ न तो कभी आतंकवादी संगठन रहा और न ही उसने कभी योजनाबद्ध तरीके से आतंक फैलाने की कोशिश की। उसे तो कांग्रेस षड्यंत्र रच कर बदनाम करना चाहती है। भागवत को तो यह भी स्वीकार करना पड़ा कि जब कभी अतिवादी लोग संघ में घुसे, उन्हें बाहर कर दिया गया। ऐसा कह कर उन्होंने साफ तौर पर बम विस्फोटों में शामिल आरोपियों से अपना कोई भी नाता न होने की दलील दी। चाहे यह कांग्रेस का षड्यंत्र हो या फिर वाकई संघ के नीति-निर्देश से बाहर जा कर उग्र प्रतिक्रियावादियों ने घटिया हरकत की हो, मगर इसमें कोई दोराय नहीं है कि विक्रम संवत् 1982 (सन् 1925) की विजयादशमी के दिन स्थापित राष्ट्रवादी संघ को पहली बार हिंदू बहुल देश में इस्लामिक कट्टरवादियों की श्रेणी में खड़ा किए जाने से उत्पन्न हालात से सामना करना पड़ रहा है। जिस संगठन के लिए राष्ट्रहित ही सर्वोपरि रहा हो, उसे अगर राष्टद्रोह का आरोप झेलना पड़ रहा है तो यह निस्संदेह शर्मनाक है। स्वयं संघ के लिए भी और उनके लिए भी, जो चंद अतिवादियों की हरकत से पूरे संघ को ही कटघरे में खड़ा किए दे रहे हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे ही देशभर में जगह-जगह इस्लामिक संगठनों ने विस्फोट का सिलसिला शुरू किया तो संघ पृष्ठभूमि के कुछ अति उत्साही स्वयंसेवकों के भीतर प्रतिक्रिया का भाव जागृत हुआ। यद्यपि यह कोर्ट ही तय करेगा कि संघ के लोगों ने विस्फोट किए या नहीं, मगर इतना तो तय सा लग रहा है कि किसी न किसी स्तर पर उनकी संलिप्तता जरूर रही होगी, वरना एटीएस बिलकुल हवा में तो आरोप तय नहीं कर रहा। भागवत के बयान से भी संकेत मिलता है कि षड्यंत्र में संघ के किसी भी स्तर पर शामिल न होने पर भी कुछ अतिवादियों ने ऐसी हरकत कर दी होगी, जिसका खामियाजा संघ को भुगतना पड़ रहा है। सवाल ये उठता है कि भले ही संघ के किसी कार्यालय में विस्फोट की साजिश नहीं रची गई, लेकिन संघ से किसी न किसी रूप में जुड़े लोगों का ऐसी हरकत को गंभीरता से क्यों नहीं लिया? संघ ने कांग्रेस को कथित रूप से कुप्रचार करने का मौका क्यों दिया? यदि संघ प्रमुख भागवत को ऐसे लोगों के बारे में जानकारी हो गई थी तो उन्होंने सरकारी जांच एजेंसियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी, ताकि समय रहते उनसे छुटकारा पा लिया जाता। क्यों भाजपा नेता संघ के बचाव में लगातार यह रट लगाते रहे कि कांग्रेस उसे झूठा ही बदनाम कर रही है? इसका परिणाम ये हुआ कि जैसे ही चार्जशीट पेश हुई और उसमें इंद्रेश कुमार जैसे जिम्मेदार पदाधिकारी पर भी शक की सुई घूमी तो भाजपा नेताओं की बोलती बंद हो गई। उनके पास यह कहने के सिवाय कोई चारा न रहा कि कांग्रेस सरकार उन्हें झूठा फंसा रही है। दूसरी ओर संघ व भाजपा पर अब तक सांप्रदायिक होने का आरोप लगाने वाली कांग्रेस को भगवा आतंकवाद का शब्द गढऩे का मौका मिला गया। इसके अतिरिक्त पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे को इस आरोप का भी सामना करना पड़ा कि जानकारी तो उनको भी हो चुकी थी कि बम विस्फोट में किन लोगों का हाथ था, मगर जानबूझ कर मामले को दबाये रखा। यद्यपि जब तक कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता, तब तक कुछ भी सुनिश्चित करना असंभव है, लेकिन जिस प्रकार घटनाक्रम घूमा है, भाजपा व संघ को रक्षात्मक मुद्रा में आना पड़ा है।
बहरहाल, संघ प्रमुख भागवत के रवैये से स्पष्ट है कि वे अब हर हाल में भगवा आतंकवाद के कथित जबरन थोपे गए दाग से संघ को मुक्त करवाना चाहेंगे। इस दिशा में प्रयास शुरू कर भी दिए गए हैं। इसके लिए दो स्तर पर काम करना होगा। एक ओर जनता में हुए कुप्रचार को साफ करना और दूसरा संघ के नेटवर्क को और मजबूत करके अतिवादियों पर अंकुश लगाना। उम्मीद है अजमेर प्रवास के दौरान वे कुछ ठोस निर्णय लेने का आगाज करेंगे। इसके लिए निस्संदेह अजमेर सर्वाधिक उपयुक्त स्थान है। इस शहर का आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व इसी तथ्य से आंका जा सकता है कि सृष्टि के रचयिता प्रजापिता ब्रह्मा ने तीर्थगुरू पुष्कर में ही आदि यज्ञ किया था। सूफी मत के कदीमी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती ने भी रूहानी संदेश के लिए अजमेर को ही चुना। इतना ही नहीं सियासी नजरिये से भी इस भूमि के गौरव का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह सम्राटों, बादशाहों और ब्रितानी शासकों की सत्ता का केन्द्र रहा है। उम्मीद है कि मोहन भागवत भी इस ऐतिहासिक भूमि को और गौरवान्वित करेंगे।
जिस शहर में लगा संघ पर दाग, वहीं से सिंहनाद करेंगे भागवत
जैसे ही यह जानकारी अखबारों में शाया हुई है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघ चालक प्रमुख भागवत पांच दिन के लिए अजमेर आ रहे हैं, तो हरएक की जुबान पर यह सवाल है कि संघ पदाधिकारियों की बैठकें लेने और आमसभा करने के लिए उन्होंने अजमेर को ही क्यों चुना है। यह गतिविधि तो प्रदेश मुख्यालय जयपुर में भी हो सकती थी। जानकार लोग इसे सीधे तौर पर ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह में हुए बम विस्फोट और उसकी वजह से संघ पर उठ रही संदिग्ध नजरों के साथ जोड़ कर देख रहे हैं। समझा जाता है कि भागवत यहां न केवल संघ में प्रवेश कर गए उग्रपंथी तत्वों से सावधान रहने की नीति तय करेंगे, अपितु भगवा आतंकवाद का टैग उतारने के लिए इसी पाक शहर से संघ के पाक साफ होने का सिंहनाद भी करेंगे।
उल्लेखनीय है कि लंबी जांच-पड़ताल के बाद जब जांच एजेंसियां इस निष्कर्ष पर पहुंची कि दरगाह बम विस्फोट में संघ से जुड़े लोगों का हाथ है और इस सिलसिले में गिरफ्तारियां भी हुईं तो पहली बार संघ के नेताओं की पेशानी पर चिंता की लकीरें उभर आईं। हैदराबाद की मक्का मस्जिद और मालेगांव सहित अजमेर की दरगाह ख्वाजा साहब में हुए बम विस्फोटों से संघ से जुड़े लोगों के नाम जुडऩे के साथ ही देशभर में भगवा आतंकवाद पर भी गरमागरम बहस छिड़ गई। एटीएस की ओर से कोर्ट में पेश की गई 809 पेज की चार्जशीट में पहले तो संघ के वरिष्ठ नेता इंद्रेश जी का नाम आया और फिर चार्जशीट के पन्नों को खंगाला गया तो मुख्य आरोपी सुनील जोशी की डायरी में संघ के प्रवक्ता राम माधव सहित गोरखपुर के भाजपा सांसद आदित्यनाथ व अरसे तक प्रचारक रहे अनिल के नाम भी उभर कर आ गए। ऐसे में भगवा आतंकवाद के नाम पर कड़ा ऐतराज करने वाले तमाम भाजपा नेताओं के सुर यकायक नीचे हो गए हैं। यहां तक कि संघ प्रमुख भागवत तक को यह कहना पड़ गया कि संघ कभी आतंकवाद का पोषक नहीं रहा और जब कभी उग्र विचार के लोग संघ में घुस गए, उन्हें या तो बाहर कर दिया गया या फिर ऐसे हालात कर दिए गए कि वे संघ छोड़ कर चले गए। ऐसा कह कर उन्होंने साफ तौर पर बम विस्फोटों में शामिल आरोपियों से अपना पल्लू छुड़वा लिया है।
राजस्थान में भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व गृह मंत्री शांति धारीवाल ने संघ के कुछ लोगों के आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगाए और छींटे जब पूरे संघ पर लगने लगे तो मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी को इन्द्रेश कुमार का बचाव करते हुए कहना पड़ा कि सरकार उन्हें झूठा फंसाने का षड्यंत्र रच रही है। यह एक ऐसे व्यक्तित्व को बदनाम करने की साजिश है, जिसने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के माध्यम से सभी मजहबों में भाईचारा कायम करने के लिए सेतु का काम किया है। कुल मिला कर बयानों के युद्ध के बीच इस बात इशारा तो मिलता है कि संघ की अनुशासित फौज में नहीं चाहते हुए भी एक नया उग्रवादी वर्ग उभर रहा रहा है। उसे बचाने का प्रयास करने पर आंच बड़े नेताओं तक पहुंचने लगी है।
असल में देशभर में अब तक हुई अनेकानेक आतंकी वारदातों में लगातार कट्टरपंथी मुस्लिमों के नाम आने और उनके पाकिस्तान से जुड़े होने के कारण यह आम धारणा बन गई थी कि केवल इस्लामिक आतंकवाद ही वजूद में है। मगर मालेगांव में 29 सितंबर 2008 को हुए बम विस्फोट के मामले में ठाकुर प्रज्ञासिंह के गिरफ्तार होने के साथ ही यह विवाद उठ खड़ा हुआ कि कांग्रेस हिंदूवादियों के नाम भी आतंकवाद से जोड़ कर इसे भगवा आतंकवाद का नाम दे रही है। न केवल संघ और भाजपा से जुड़े नेताओं ने भगवा आतंकवाद के नाम पर ऐतराज जताना शुरू कर दिया, अपितु हिंदूवादी मानसिकता के पत्रकारों ने भी इस शब्द की विवेचना कर यह साबित करने की कोशिश की कि हिंदू कभी आतंकवादी हो ही नहीं सकता। हिंदू जमात को शांतिप्रिय और सहिष्णु साबित करने के लिए सबसे बड़ा तर्क ये दिया गया कि अगर हिंदू उग्रवादी होता तो देश पर कभी मुगल शासक कब्जा नहीं कर सकते थे। वस्तुत: हिंदुओं को सहिष्णु बताने के सिलसिले में दिए गए ये तर्क सौ फीसदी सच ही नजर आते हैं, मगर कुछ कट्टरपंथी हिंदूवादियों को बचाने की खातिर संपूर्ण हिंदू जमात की सहिष्णुता, जिसे एक अर्थ में कायरता भी कहा जाता है, वह सही ठहराई जा रही है। जब कि वस्तु स्थिति यही नजर आती है कि संघ से जुड़े कुछ कट्टरपंथी चाहे-अनचाहे अब उग्रवाद की ओर बढ़ रहे हैं। इस ओर एटीएस की चार्जशीट में भी इशारा किया गया है। चार्जशीट में कहा गया है कि संघ ने भले ही संगठन के स्तर पर योजनाबद्ध तरीके से विस्फोटों की साजिश नहीं रची हो, मगर संघ से जुड़े कुछ लोगों ने देशभर में इस्लामी आतंकवाद की प्रतिक्रिया में बम विस्फोट किए हैं।
यहां उल्लेखनीय है कि संघ के नेता इंद्रेश कुमार पर जैसे ही यह आरोप लगा कि उनकी भी बम विस्फोट में कोई भूमिका है, उनके कथित मित्र और छत्तीसगढ़ हज कमेटी व मदरसा बोर्ड के सदर सलीम रजा यहां उनकी सलामती के लिए ख्वाजा साहब के दर पर दुआ मांगने आए थे। इतना ही नहीं उन्होंने जाते-जाते खुद व ख्वाजा साहब के बीच हुई निहायत निजी दुआ को उजागर भी कर दिया, ताकि पूरे मुल्क में यह संदेश जाए कि मुस्लिमों को भी यकीन नहीं कि वे दरगाह में बम फोडऩे की हरकत करवा सकते हैं। इतना ही नहीं रजा ने इंद्रेश कुमार को संघ से जुड़े होते हुए भी हिंदू-मुस्लिम एकता का सच्चा हिमायती होने का ऐलान कर दिया।
इन सब से इतर सर्वाधिक उल्लेखनीय बात ये है कि हाल ही एक मुस्लिम संगठन ने भी एक जलसा करने के लिए अजमेर को चुना और दरगाह बम विस्फोट में शामिल लोगों पर गिरफ्त मजबूत करने पर जोर दिया था। उस जलसे के तुरंत बाद संघ प्रमुख की पांच दिन की मौजूदगी से शहर और अधिक संवेदनशील हो जाएगा।
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