गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

अब उमा को थूक कर चाटने की तैयारी

पार्टी विथ दि डिफ्रेंसज् का तमगा लगाए हुए भाजपा समझौता दर समझौता करने को मजबूर है। पहले उसने पार्टी की विचारधारा को धत्ता बताने वाले जसवंत सिंह व राम जेठमलानी को छिटक कर गले लगाया, कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा व राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की बगावत के आगे घुटने टेके और अब उमा भारती को थूक कर चाटने को तैयार है। हालांकि फिलवक्त उन्होंने अपनी राजनीतिक दिशा तय करने के लिए कुछ दिन की मोहलत मांगी है, मगर पक्की जानकारी यही है कि पार्टी के शीर्षस्थ नेता लाल कृष्ण आडवानी उन्हें पार्टी में वापस लाने की पूरी तैयार कर चुके हैं।
राजनीति में समझौते तो करने ही होते हैं, मगर जब से भाजपा की कमान नितिन गडकरी को सौंपी गई है, उसे ऐसे-ऐसे समझौते करने पड़े हैं, जिनकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। असल में जब से अटल बिहारी वाजपेयी व लाल कृष्ण आडवाणी कुछ कमजोर हुए हैं, पार्टी में अनेक क्षत्रप उभर कर आ गए हैं, दूसरी पंक्ति के कई नेता भावी प्रधानमंत्री के रूप में दावेदारी करने लगे हैं। और सभी के बीच तालमेल बैठाना गडकरी के लिए मुश्किल हो गया है। हालत ये हो गई कि उन्हें ऐसे नेताओं के आगे भी घुटने टेकने पड़ रहे हैं, जिनके कृत्य पार्टी की नीति व मर्यादा के सर्वथा विपरीत रहे हैं।
ज्यादा दिन नहीं बीते हैं। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ में पुस्तक लिखने वाले जसवंत सिंह को बाहर का रास्ता दिखाने के चंद माह बाद ही फिर से गले लगा लिया था। कितने अफसोस की बात है कि अपने आपको सर्वाधिक राष्ट्रवादी पार्टी बताने वाली भाजपा को ही हिंदुस्तान को मजहब के नाम पर दो फाड़ करने वाले जिन्ना के मुरीद जसवंत सिंह को फिर से अपने पाले में लेना पड़ा।
वरिष्ठ एडवोकेट राम जेठमलानी का मामला भी थूक कर चाटने के समान है। भाजपाइयों के आदर्श वीर सावरकर की तुलना पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना से करने, जिन्ना को इंच-इंच धर्मनिरपेक्ष तक करार देने, पार्टी की मनाही के बाद इंदिरा गांधी के हत्यारों का केस लडऩे, संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी नहीं देने की वकालत करने और पार्टी के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ ही चुनाव मैदान में उतरने वाले जेठमलानी को पार्टी का प्रत्याशी बनाना क्या थूक कर चाटने से कम है।
पार्टी में क्षेत्रीय क्षत्रपों के उभर आने के कारण पार्टी को लगातार समझौते करने पड़ रहे हैं। विधायकों का बहुमत साथ होने के बावजूद विधानसभा में विपक्ष के नेता पद से हटाए जाने के आदेश की अवहेलना करने पर पार्टी वसुंधरा के खिलाफ कठोर निर्णय करने से कतराती रही। वजह साफ थी वे राजस्थान में नई पार्टी बनाने का मूड बना चुकी थीं, जो कि भाजपा के लिए बेहद कष्टप्रद हो सकता था। संघ लॉबी चाह कर भी वसुंधरा के कद को नहीं घटा पाई। उन्हें केन्द्रीय कार्यकारिणी में सम्मानजनक पद देना पड़ा। पार्टी ने सोचा कि ऐसा करने से वसुंधरा को राजस्थान से कट जाएंगी, मगर वह मंशा पूरी नहीं हो पाई। प्रदेश अध्यक्ष भले ही उसकी पसंद का है, मगर आज भी राज्य में पार्टी की धुरी वसुंधरा ही हैं। इसका सबसे बड़ा सबूत ये है कि वे पार्टी की राह से अलग चलने वाले राम जेठमलानी को न केवल पार्टी का अधिकृत प्रत्याशी बनवा लाई, अपितु अपनी कूटनीतिक चालों से उन्हें जितवा भी दिया। वसुंधरा के मामले में पार्टी की स्थिति कितनी किंकर्तव्यविमूढ़ है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब से उन्होंने विपक्ष के नेता का पद छोड़ा है, आज तक दूसरे किसी को उस पद पर आसीन नहीं किया जा सका है।
हाल ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के मामले में भी पार्टी को दक्षिण में जनाधार खोने के खौफ में उन्हें पद से हटाने का निर्णय वापस लेना पड़ा। असल में उन्होंने तो साफ तौर पर मुख्यमंत्री पद छोडऩे से ही इंकार कर दिया था। उसके आगे गडकरी को सिर झुकाना पड़ गया।
उमा भारती के मामले में भी पार्टी की मजबूरी साफ दिखाई दे रही है। जिन आडवाणी को पहले पितातुल्य मानने वाली मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने उनके ही बारे में अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल किया, वे ही उसे वापस लाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। पार्टी से बगावत कर नई पार्टी बनाने को भी नजरअंदाज करने की नौबत यह साफ जाहिर करती है कि भाजपा अंतद्र्वंद में जी रही है।
थोड़ा पीछे मुड़ कर देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद ही भाजपा का ढांचा चरमराया हुआ है। कांग्रेसनीत सरकार लाख बुराइयों के बावजूद सत्ता पर फिर काबिज हो गई। मूलत: हिंदुत्व की पक्षधर, मगर राजनीतिक मजबूरी के चलते मुसलमानों को भी गले लगाने का नाटक करते हुए दोहरी मानसिकता में जी रही भाजपा की तो चूलें ही हिल गईं। पार्टी में इतना घमासान हुआ कि एक बारगी तो नाव के खिवैया बन कर डूबने से बचाने वाले शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी ही पार्टी के भीतर अप्रांसगिक महसूस होने लगे। यहां तक कि कट्टर हिंदुत्व के पक्षधरों को ही हार की मूल वजह माना जाने लगा। पार्टी के दिग्गजों को अपनी मौलिक विचारधारा की दुबारा समीक्षा करने नौबत आ गई। उन्हें यही समझ में नहीं आ रहा था कि पार्टी को प्रतिबद्ध हिंदुत्व की राह पर चलाया जाए अथवा लचीले हिंदुत्व का रास्ता चुना जाए। आखिरकार सभी संघ की ओर ही मुंह ताकने लगे। संघ ने कमान संभाली और नए सिरे से शतरंज की बिसात बिछा दी। उसी का ही परिणाम था कि पार्टी को लोकसभा में विपक्ष का नेता बदलना पड़ा। बदले समीकरणों में गडकरी अध्यक्ष पद तो काबिज हो गए, मगर उन्हें लगातार समझौते करने पड़ रहे हैं।

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

दो साल में कांग्रेसियों को कुछ नहीं दिया गहलोत ने


प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भले ही अपने दो साल के कार्यकाल की उपलब्धियां गिना कर नहीं थकें, मगर जिन कार्यकर्ताओं के दम पर वे सत्ता का स्वाद आनंद भोग रहे हंै, उन्हें तो निराशा ही हाथ लगी है। नरेगा, प्रशासन शहरों की ओर, प्रशासन गांवों की ओर जैसे अभियानों से आम आदमी को भले ही दोनों हाथों से लुटा रहे हों, मगर कार्यकर्ताओं को उन्होंने कुछ नहीं दिया है। वे अब भी राजनीतिक नियुक्तियों को तरस रहे हैं। रोष तो उनमें बहुत है, मगर कर कुछ नहीं पा रहे। मलाईदार पदों की छोड़ भी दें, मगर संगठन के पदों पर नई नियुक्तियों का इंतजार करते-करते भी एक साल बीतने को आया है। सत्ता व संगठन के बीच तालमेल न होने के कारण प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर भी नई नियुक्ति नहीं हो पा रही। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को गहलोत इस रवैये पर बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि क्या से वही गहलोत हैं, जिन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के नाते प्रदेशभर के कार्यकर्ताओं में अपनी पहचान बनाई थी और उन्हें कार्यकर्ताओं की भावनाओं के बारे में भी भरपूर जानकारी है।
राजनीति जानकारों का मानना है कि पिछली बार के मुख्यमंत्री गहलोत और इस बार के मुख्यमंत्री गहलोत में काफी फर्क है। इस बार जब से मुख्यमंत्री बने हैं, तब से न जाने कितनी बार मीडिया उनसे पूछ चुका है कि राजनीतिक नियुक्तियां कब कर रहे हैं और वे भी न जाने कितनी बार यह कह चुके हैं कि बस अब जल्द ही तोहफे बांटे जाएंगे। रहा सवाल कांग्रेसियों का तो जो भी उनके पास हाजिरी देने जाता है, उससे बड़ी गर्मजोशी से मिल कर जादूई स्टाइल में मुस्कराते हैं और सिर्फ एक ही बात कहते हैं, तसल्ली रखो, मुझे सब कुछ ध्यान में है, जल्द ही कुछ करेंगे। ऐसा कहते-कहते उन्होंने पूरे दो साल निकाल दिए। अब तो कांग्रेसियों को भी निराशा होने लगी है। उन्हें बार-बार जा कर भिखारी की तरह मांगने में शर्म आने लगी है। कई कार्यकर्ता तो इस कारण उनके सामने जाने से कतराने लगे हैं कि कहीं टोक न दें कि एक बार कह दिया न कि तसल्ली रखें, समय आने पर सब कुछ मिलेगा। राजनीनिक नियुक्ति की आशा में अपना निजी व्यवसाय चौपट कर चुके कांग्रेसी तो अब सब कुछ छोड़ छाड़ कर वापस धंधे पर ध्यान देने की सोच रहे हैं।
हालांकि दो साल पूरे होने पर एक बार फिर राजधानी में तोहफे बंटने की चर्चा जोरों पर है, मगर कांग्रेसियों को यही लगता है कि जन्म से जादूगर गहलोत के झोले में से कुछ नहीं निकलने वाला है। वे इस बार काफी कंजूस हो गए हैं। या फिर उन्हें यह समझ में आ गया है कि जब तक कुछ नहीं बांटो, कार्यकर्ता मुंह ताकता है, देने के बाद तो मुट्ठी खुल जाएगी। या फिर उन्हें ये रहस्य पता लग गया है कि कार्यकर्ताओं को देने के लालच में अटकाए रखो तो वे काम करते हैं, मलाई चखाने से तो बिगड़ जाते हैं। अभी तो कोई सेवा मांग रहे हैं और सेवा कार्य दे दिए जाने के बाद खुद की सेवा में लग जाएंगे। इसी का परिणाम रहा कि पिछली बार सुशासन देने के कारण देश के नंबर वन मुख्यमंत्री घोषित होने के बाद भी सत्ता में लौट नहीं पाए। अकाल राहत के नाम पर इतना लुटाया कि चुनाव के दो-तीन माह के बाद तक ग्रामीणों के घरों में गेहूं की बोरियां पड़ी थीं, मगर यही सेवा मांगने वाले जन-जन तक गहलोत की उपलब्धियों को नहीं पहुंचा पाए थे। कार्यकर्ताओं व छोटे नेताओं की छोडिय़े, मंत्री पद पर बैठे नेता तक यहीं इंतजार कर रहे हैं कि उन्हें अब तक के परफोरमेंस को देख कर कोई अच्छा विभाग मिल जाएगा। कई विधायक भी इसी इंतजार में हैं कि कब मंत्रीमंडल का विस्तार अथवा फेरबदल हो और उनका नंबर आए।
समझदानी में सियासत की बारीकियां रखने वाले मानते हैं कि असल में गहलोत को इतनी फुर्सत ही नहीं कि कार्यकर्ताओं पर ध्यान दे पाएं। असल में उन्हें तो अपनी ही कुर्सी की चिंता लगी रहती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सी. पी. जोशी ने नींद हराम कर रखी है। वे आए दिन कोई घोचा कर देते हैं। केन्द्रीय मंत्री होने के कारण अधिकांश समय दिल्ली में रहते हैं, इस कारण वहां बैठे-बैठे सोनिया गांधी के प्रमुख सलाहकारों के बीच चक्कर चलाते रहते हैं। खुद ही कई बार मुख्यमंत्री पद का दावेदार होने की सुर्री छोड़ चुके हैं। हालांकि बताया जाता है कि सोनिया दरबार में गहलोत के पैर जमे हुए हैं, मगर राजनीति का क्या भरोसा, कब पलटी खा जाए। इसकी वजह ये है कि कांग्रेस में सत्ता का केन्द्र अब केवल सोनिया गांधी ही नहीं है, राहुल बाबा की भी चलती है। और राहुल के रजिस्टर में जोशी ने खासे नंबर हासिल कर रखे हैं। यही वजह है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर नई नियुक्ति नहीं हो पा रही है। जोशी चाहते हैं उनकी पसंद का अध्यक्ष हो, जो गहलोत को चैक करता रहे, जबकि गहलोत चाहते हैं कि उनसे ट्यूनिंग बैठाने वाला अध्यक्ष बने। इसी खींचतान में इसी साल एक जनवरी को शुरू हुए संगठन चुनाव की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो पा रही है। पीसीसी व एआईसीसी के सदस्य तो तय हो गए, सदर का फैसला नहीं हो पा रहा। और जब तक सदर का फैसला नहीं होगा, तब तक भला सत्ता व संगठन के बीच मलाईदार पदों का बंटवारा कैसे हो सकता है?

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

अधिकार दे कर फिर छीनने लगी है सरकार

महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम की दुहाई दे कर सत्ता के विकेन्द्रीकरण और ग्राम स्वराज के नारे देने वाली प्रदेश की कांग्रेस सरकार दोहरी नीति पर चलती दिखाई दे रही है। एक ओर वह ग्राम पंचायतों को अधिकार देकर मजबूत करने की लफ्फाजी करती है तो दूसरी ओर धीरे से उनके अधिकार छीन रही है। बुधवार को प्रदेश सरकार के एक प्रमुख चालक व शिक्षा मंत्री मास्टर भंवरलाल अजमेर में शिक्षा विभाग की संभागीय बैठक में भाग लेने आए तो उन्होंने अधिकारियों को जो स्पष्ट निर्देश दिए, उससे तो साफ जाहिर है कि सरकार के दिखाने के दांत और हैं तो खाने के और।
मेघवाल ने अधिकारियों को उनके अधिकारों के प्रति उकसाते हुए साफ तौर पर कहा कि वे जनप्रतिधियों से घबराएं नहीं और केवल उन्हें बताए नियमानुसार ही काम करें। इसका मतलब साफ है कि मंत्री महोदय ने जो कहा है केवल उसे ही मानना है, जिला प्रमुख व प्रधान का नहीं। हद तो तब हो गई, जब उन्होंने उन्हीं की तरह जनता के वोटों से जीत कर आए जिला प्रमुखों व प्रधानों के बारे में कठोरता से कह दिया कि वे शहरी क्षेत्र की स्कूलों व अन्य हस्तांतरित विभागों में हस्तक्षेप नहीं कर पाएंगे। पंचायतीराज के जनप्रतिनिधि केवल गांवों में ही अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सकते हैं, वह भी सरकार की ओर से तय सीमा तक। यानि ग्रामीण जनप्रतिधियों के अधिकारों को सीमित किया जा रहा है। अर्थात चलेगी तो केवल बड़ी सरकार की, गांवों की सरकारें केवल दिखाने के लिए बनाई गई हैं? तो फिर सवाल ये उठता है कि आखिर शिक्षा सहित अन्य विभाग पंचायतीराज को हस्तांतरित करने का ढिंढोरा पीटा ही क्यों था? यदि अधिकारियों के पास ही सारे अधिकार सुरक्षित हंै तो फिर चाहे अधिकार विभिन्न विभागों के प्रदेश प्रमुखों के पास हों या फिर पंचायतीराज के अधिकारियों के पास, क्या फर्क पड़ता है? अहम सवाल ये भी उठता है कि ग्रामीण जनप्रतिनिधियों को जनता ने चुन कर भेजा ही क्यों है, जब अधिकारी केवल सरकार के इशारे पर ही काम करेंगे? कहीं ऐसा तो नहीं कि जब सरकार ने गांवों की सरकार को मजबूत करने का निर्णय किया था तब उसे ख्याल में ही नहीं था कि ये सरकारें उसके अधिकारों में आड़े आएंगी? वरना अब जा कर इस प्रकार के निर्देश देने की जरूरत ही क्यों पड़ी है?
असल में शिक्षा मंत्री महोदय का यह रुख इस कारण बना दिखता है कि उन्होंनेे समायोजन के तहत जिन शिक्षकों को तबादला कर दिया था, उन पर जिला प्रमुखों व प्रधानों के दखल के कारण अमल नहीं हो पाया था। अजमेर में इसका प्रत्यक्ष उदाहरण सबके सामने है। जिला शिक्षा अधिकारी प्रारंभिक बिरदा सिंह रावत को केवल इसी कारण यहां से रुखसत होना पड़ा क्यों कि उन्होंने जिला प्रमुख के दबाव में सरकारी तबादला सूची को एक तरफ रख दिया था। शिक्षा मंत्री ने उन चालीस तबादलों पर रोक के आदेश को निरस्त करने को कहा। साथ ही यह भी कहा कि किसी के भी कहने पर गलत काम मत करो। शिक्षा मंत्री ने जिला परिषद की सीईओ शिल्पा से जवाब तलब के दौरान जो दिशा-निर्देश दिए, उससे तो यह साफ झलक रहा था कि वे जिला प्रमुख श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के खिलाफ उन्हें उकसा रहे हैं। असल बात तो ये है कि शिल्पा ने बाकायदा अपना दु:खड़ा रोया था, जिस पर उन्होंने कहा कि वे तसल्ली रखें, सरकार जल्द ही नए दिशा-निर्देश जारी करके भेज रही है। शिल्पा ने पूछा था कि क्या सारी फाइलें जिला प्रमुख के पास भेजना जरूरी है तो शिक्षा मंत्री ने कहा कि इस बारे में तीन मंत्रियों की कमेटी के निर्देश आपके पास आ जाएंगे।
शिक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि तबादलों पर पूर्ण प्रतिबंध है। परिषद व पंचायत समितियों में स्थापना समितियों ने यह काम शुरू कर दिया है। इस पर सीईओ को लगाम कसनी होगी। वे कंट्रोल अपने हाथ में लें। वे दबाव में नहीं आएं।
कुल मिला कर शिक्षा मंत्री महोदय ने साफ तौर पर ग्रामीण जनप्रतिनिधियों को धत्ता बताते हुए अधिकारियों को और अधिकार संपन्न कर दिया है। ऐसे में जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों में टकराव और बढ़ेगा। जो अधिकारी मजबूत होगा वह तो सरकार की शह पर जनप्रतिनिधि से टकराव मोल ले लेगा और जो अधिकारी कमजोर होगा व जनप्रतिनिधि की मानेगा, सरकार उसकी खाल खींच लेगी। सरकार के इस रुख से तो यही प्रतीत होता है कि जिला परिषदों के जरिए तृतीय श्रेणी शिक्षकों की जो भर्ती होने वाली है, वह कहने भर तो जिला परिषदों के माध्यम से होगी, दखल पूरा राज्य सरकार का ही रहेगा।

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

गर्ग साहब, तो फिर विखंडन कहते किसे हैं?

राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर का जयपुर में भी एक भवन बनाए जाने पर जैसे ही स्थानीय विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी ने विखंडन की आशंका जताई, वैसे ही त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सुभाष गर्ग ने इस आशंका को निराधार बता दिया है। उन्होंने कहा कि बोर्ड का विखंडन नहीं किया जा रहा है। जयपुर में जो भवन बनाया जाना है, उसमें विद्यार्थी सेवा केन्द्र, उत्तर पुस्तिका संग्रहण और गेस्ट हाउस प्रस्तावित हैं। उन्होंने तर्क तो बड़ी चतुराई से दिए हैं, मगर उन्हीं से यह साबित हो रहा है, बोर्ड के काम का विकेन्द्रीकरण किया जा रहा है। विकेन्द्रीकरण और विखंडन भले ही शब्द अलग-अलग हों, मगर उनका प्रतिफल तो एक ही है। आखिरकार उससे बोर्ड का अजमेर में हो रहा काम बंटेगा ही ना।
सवाल उठता है कि जब बोर्ड के पास यहां पर ही पर्याप्त स्थान है और नया निर्माण कार्य भी हो रहा है तो आखिर जयपुर में उत्तर पुस्तिका संग्रहण व प्रशिक्षण केन्द्र के लिए अलग से जगह की जरूरत क्या है? जयपुर में अलग से बोर्ड भवन बना रहे हैं तो यह भी स्पष्ट है कि इससे अजमेर के बोर्ड दफ्तर का काम कुछ कम हो जाएगा। आखिर विखंडन फिर किसे किसे कहा जाता है?
उन्होंने तर्क ये दिया है कि डीपीसी सहित अन्य बैठकें जयपुर में बन रहे भवन के गेस्ट हाउस में हुआ करेंगी। अव्वल तो जयपुर में बैठकें करेंगे ही क्यों, क्या वे बैठकें अजमेर में नहीं हो सकतीं? क्या ऐसा करके बोर्ड प्रबंधन की बैठकों को विखंडित नहीं किय जा रहा है? फिर बाद में डॉ. गर्ग या उनके बाद आने वाले अध्यक्ष जयपुर में ही सारी या अधिकतर बैठकें किया करेगा तो उसे रोकने वाला कौन होगा? वे ये कह रहे हैं कि गेस्ट हाउस से बोर्ड कर्मचारियों को सुविधा होगी। क्या उन्होंने आकलन कर लिया है कि बोर्ड कर्मचारियों के जयपुर में अन्यत्र ठहरने का खर्चा गेस्ट हाउस बनने व उसे संचालित करने पर सालभर में होने वाले खर्चे से काफी कम है?
उन्होंने विद्यार्थियों की सुविधा के लिए जयपुर के नए भवन सहित प्रदेश के सभी जिलों में विद्यार्थी सेवा केन्द्र खोले जाने की बात कही है। क्या यह बोर्ड के काम का विकेन्द्रकरण और बोर्ड का विखंडन नहीं है? क्या इससे अजमेर के लोगों की आय पर असर नहीं पड़ेगा? हालांकि उनकी यह बात सही है कि इससे विद्यार्थियों को सुविधा होगी, मगर यदि केवल विद्यार्थी हित की ही बात है तो यह स्वीकार करने में फिर दिक्कत क्या है कि हां, एक तरह से विखंडन (विकेन्द्रीकरण) ही कर रहे हैं।
वस्तुत: बोर्ड विखंडन की बात से कहीं कर्मचारी न भडक़ जाएं, उन्होंने पहले ही साफ कर दिया कि यहां से कोई भी शाखा और कोई भी कर्मचारी स्थानांतरित किया जा रहा है। सवाल ये उठता है कि जयपुर के भवन में क्या जादू या रोबोट से काम करवाया जाएगा? जाहिर तौर पर वहां भी कर्मचारियों की जरूरत होगी। भले ही यहां से किसी कर्मचारी को न भेजा जाए, मगर वहां कर्मचारी नियुक्त तो करने ही होंगे। क्या वे बोर्ड कर्मचारी नहीं कहलाए जाएंगे? क्या उनकी तनख्वाह बोर्ड के फंड से नहीं दी जाएगी? और इस बात की गारंटी क्या है कि अभी नहीं तो भविष्य में भी यहां का कर्मचारी वहां नहीं भेजा जाएगा? क्या उन्होंने इस बारे में बोर्ड कर्मचारी संघ से कोई करार किया है? क्या उनके इस आश्वासन का कोई लिखित दस्तावेज मौजूद है? आश्चर्य तो इस बात का है कि बोर्ड के ताजा कदम से सबसे ज्यादा जो कर्मचारी वर्ग प्रभावित होगा, उन्हीं का संगठन चुप बैठा है। संदेह होता है कि क्या उन्होंने संघ के नेताओं को सैट कर लिया है?
असल बात तो ये है कि बोर्ड का विखंडन तो पहले से ही शुरू हो चुका है। पहले बोर्ड दूरस्थ शिक्षा के तहत परीक्षा आयोजित करवाता था, उसे यहां बंद कर अलग से ओपन बोर्ड बना दिया गया। क्या यह विखंडन नहीं है? इसी प्रकार पहले बोर्ड खुद पुस्तकों का प्रकाशन करता था, वह उसने पाठ्यपुस्तक मंडल को सौंप दिया है। क्या यह भी विखंडन नहीं है? इस विखंडन से इसी एक साल में बोर्ड की करीब दस से बारह करोड़ की आय छिन गई है।
ऐसा प्रतीत होता है कि बोर्ड अध्यक्ष को बोर्ड की आमदनी से भी कोई लेना-देना ही नहीं है। वे तो केवल वाहवाही लूटना चाहते हैं। जयपुर व अजमेर में हो रहे निर्माण कार्यों पर तकरीबन तीस करोड़ रुपए लग जाएंगे। इसका ब्याज कितना होता है? क्या यह उन्हें पता नहीं है कि बोर्ड की जिस आय को जो खर्च किया जा रहा है, वह बोर्ड कर्मचारियों की तनख्वाह बांटने के काम आती है? अभी तो कुछ भी नहीं हुआ है, आगे-आगे देखिए होता है क्या? ये तो गनीमत रही कि मौजूदा शिक्षा मंत्री मास्टर भंवरलाल ने केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के इस दबाव को फिलहाल नहीं माना कि दसवीं की परीक्षा स्कूल स्तर पर ही करवा लिया जाए और बोर्ड केवल बारहवीं की परीक्षा आयोजित करे। आज नहीं तो कल, ऐसा होना ही है। तब परीक्षा से होने वाली बोर्ड की आय एक तिहाई रह जाएगी। बोर्ड अध्यक्ष भले ही यह कह रहे हैं कि बोर्ड में नई भर्ती का प्रस्ताव भेजा जा रहा है, लेकिन वस्तुस्थिति ये है कि बाद में हालत ये हो जाएगी कि मौजूदा स्टाफ ही सरप्लस नजर आने लगेगा।
कुल मिला कर सच तो ये है कि बोर्ड को विखंडित तो किया जा रहा है, बस चालाकी ये है कि उसे वे विखंडित करना मान नहीं रहे हैं।

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

ये कैसा आदर्श पेश किया गडकरी ने?

च्पार्टी विथ द डिफ्रेंसज् के नाम पर वोट बटोरने वाली और राजनीति में शुचिता की झंडाबरदार भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने अपने बेटे की शादी को जिस शाही अंदाज से अंजाम दिया है, उससे यह साबित हो गया है कि पार्टी अब तथाकथित दकियानूसी आदर्शवाद के मार्ग का परित्याग कर चुकी है।
गडकरी के बेटे की शादी कितने भव्य तरीके से हुई है, इसका अनुमान इसी बात से लग जाता है कि अकेले शादी के निमंत्रण पत्रों तक पर एक करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। शादी देश की सत्ता पर काबिज होने की दूसरी सबसे प्रबल दावेदार पार्टी भाजपा के सिरमौर की थी, इस नाते उसकी भव्यता और विशालता भी उसी के अनुरूप थी। प्रीतिभोज में देश की नामचीन हस्तियों के साथ तकरीबन दो लाख लोगों के शिकरत करने के कारण नागपुर का सडक़ यातायात तो क्या हवाई मार्ग तक जाम हो गया। वीवीआईपी मेहमानों के विमानों में आने के कारण एक बार तो हालत यह हो गई कि तकरीबन तीस विमान नागपुर के आसमान में मंडराते नजर आए। उन्हें आसपास की हवाई पट्टियों पर उतारना पड़ा। भोज में कैसे व्यंजनादि कैसे होंगे, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। और इस पूरे आयोजन पर कितना पैसा फुंका होगा, इसका भी अंदाजा लगाया ही जा सकता है। आज जब शादियों पर अनाप-शनाप धन खर्च को आलोचना की दृष्टि से देखा जाता है, गडकरी के घर हुए इस जंबो आयोजन ने विरोधी दलों को तो छींटाकशी का मौका मिला ही है, खुद भाजपा के कार्यकर्ताओं तक में खुसर-पुसर है। चाय-पानी व बीड़ी-सिगरेट की थडिय़ों पर होने वाली सियासी बहसों में उनकी बोलती बंद हो गई है।
यह सही है कि शादी का आयोजन उनका निहायत निजी और पारिवारिक मामला है। वे कहां, कब, कैसे, किससे और कितनी धूमधाम से करते हैं, इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। उनके पास अपार धन है तो उसे वे खर्च करेंगे ही। और कैसे खर्च करते हैं, यह भी उनके क्षेत्राधिकार का मामला है। कोई पार्टी फंड से अनुदान लेकर तो कर नहीं रहे कि पार्टी की मीटिंग बुलवा कर तो तय करेंगे। और वे धन कुबेर हैं तो अपने दम पर, न कि भाजपा सदर होने के कारण। कदाचित सदर भी उसी के दम पर बने हों। ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने सत्ता का स्वाद चखा है, इस कारण तब जमा किया पैसा अब खर्च कर रहे हैं। और सबसे बड़ी बात ये कि क्या पार्टी आदर्शों के चक्कर में अपने बेटे की खुशी को कुर्बान कर देंगे? आदमी आखिर अपने परिवार, अपने बच्चों की खातिर कमाता है, उन पर ही खर्च नहीं करेगा तो कहां करेगा? खुशी के मौके पर किसी प्रकार की टिप्पणी करना भी अशोभनीय ही कहा जाएगा। कदाचित ऐसी टिप्पणी को इस मायने में भी लिया जा सकता है कि पूंजीवादी व्यवस्था का विरोध वे ही करते हैं, जिनके पास पूंजी नहीं होती। मगर बात छिड़ती है तो दूर तलक जाती है। उनके इस कृत्य से यह तो साबित हो ही गया है कि भाजपा भूखे-नंगों की पार्टी नहीं है। वह जमाना गया जब कार्यकर्ता के जेब खर्च से पार्टी के छोटे-मोटे आयोजन हुआ करते थे। चुनावों में कार्यकर्ता अपने घर का खाना खा कर प्रचार पर निकलते थे। अब तो पार्टी के खुद के पास ही मोटे आसामी हैं। अकेले गडकरी ने ही क्यों इससे पहले भाजपा नेता बलबीर पुंज व राजीव प्रताप रूड़ी भी इसी प्रकार के आलीशान भोज आयोजित कर पार्टी कल्चर के हो रहे रिनोवेशन का प्रदर्शन कर चुके हैं। ज्यादा दूर क्यों जाएं, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की ऐयाशियों की कानाफूसी क्या कम हुआ करती थी। राजघराने से होने कारण उनके ठाठ ही ऐसे थे कि मुख्यमंत्री का सरकारी निवास उनको एक दड़बे जैसा लगता था, जिसके जीर्णोद्धार पर उन्होंने अनाप-शनाप सरकारी धन लगा दिया था। खैर, जितने बड़े लोग, उतनी ही बड़ी बातें। अपुन ठहरे छोटे आदमी। केवल इतना ही जानते हैं कि भाजपा की शीर्ष पंक्ति के नेता ही जब अपने सार्वजनिक जीवन में ऐसा व्यवहार करेंगे तो पार्टी कार्यकर्ताओं को आम जनता के बीच जा कर च्पार्टी विथ द डिफ्रेंसज् के नाम पर वोट हासिल करना कठिन हो जाएगा।

रविवार, 5 दिसंबर 2010

क्या खादिमों की तरह तीर्थ पुरोहितों से भी सख्ती की उम्मीद करें?

विश्व प्रसिद्ध तीर्थराज पुष्कर में हाल ही एक और विदेशी युवती को नशे की हालत में हंगामा करते हुए पकड़ा गया तो एक छोटी सी खबर ऐसे छप कर रह गई, जैसे किसी राजनीतिक संगठन ने नालियों की सफाई न होने की शिकायत की हो। न तो आम जनता में किसी को कोई आश्चर्य हुआ, न ही पवित्रता की ऊंची-ऊंची बातें करने वाले किसी राजनीतिक व सामाजिक संगठन को मलाल।
असल में तीर्थराज की सडक़ों पर विदेशी पर्यटकों का सरेआम अश्लील प्रदर्शन और हंगामा अब आम होता जा रहा है। कभी वे सरे राह नग्न हो कर पुष्कर की पौराणिक मर्यादा को भंग करते हैं तो कभी उठाईगिरों की तरह उत्पात मचाते हैं। इस प्रकार के अधिकतर मामलों में पाया गया है कि वे मादक पदार्थ का अत्यधिक सेवन के कारण मानसिक संतुलन खो देते हैं। उन्हें कब्जे में लेने में ही पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ती है। रहा सवाल उनके खिलाफ कार्यवाही का तो संबंधित देश के दूतावास को सूचित कर उन्हें यहां से रवाना करने के सिवा पुलिस के पास और कोई चारा नहीं होता। इस फौरी कार्यवाही के कारण विदेशी बेखौफ हो कर खुले सांड की तरह पुष्कर में ऐसे विचरते हैं, मानो अतिथि देवा भव की परंपरा वाला यह देश उनकी चरागाह है। वे चाहे जो करें, कोई कुछ कहने वाला नहीं है।
यह हालत उस तीर्थ स्थल की है, जिसके बारे में वेद पुराणों में कहा गया है, च्च्पर्वतानां यथा मेरू, पक्षिणाम् गरुड़: यथा: तदवत समस्त तीर्थाणाम् आदि पुष्कर मिष्यते।ज्ज् अर्थात जिस प्रकार पर्वतों में सुमेरू पर्वत और पक्षियों में गरुड़़ का शिरोमणि महत्व है, उसी प्रकार समस्त तीर्थ स्थलों में पुष्कर तीर्थ सर्वोपरि तीर्थ है। पुराणों में उल्लेख है कि पृथ्वी के तीन नेत्र हैं, इनमें प्रथम और प्रमुख नेत्र पुष्कर है। पुष्कर नगरी को पृथ्वी का प्रथम नेत्र कहलाने का सौभाग्य प्रजापति ब्रह्मा के आशीर्वाद से प्राप्त हुआ है, जिन्होंने इसी नगरी से सम्पूर्ण बह्मांड की रचना की। ऐसे महान तीर्थराज की दुर्गति देख कर तो ऐसा लगता है कि यहां का कोई धणी-धोरी ही नहीं है।
यह सही है कि सरकार पुष्कर के विकास के प्रति सतत प्रयत्नशील है। हाल ही संपन्न हुए मेले के समापन समारोह में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तो यहां कहा कि आगामी वर्ष का विख्यात पुष्कर मेला और अधिक लोकप्रिय व सुविधापूर्ण होगा। इसमें भी कोई दोराय नहीं कि पर्यटन महकमे की ओर किए जाने वाले प्रचार-प्रसार के कारण यहां विदेशी पर्यटक खूब आकर्षित हुए हैं और सरकार की आमदनी भी बढ़ी है, मगर विदेशी पर्यटकों के ऊलजलूल तरीके से अंग प्रदर्शन करते हुए विचरण करने से यहां की मर्यादा और पवित्रता छिन्न-भिन्न हुई है। मगर अफसोस कि उन्हें कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है। इस मामले में तीर्थ पुरोहितों से तो दरगाह के खादिम ही अच्छे हैं, जिन्होंने कैटरीना कैफ के उघाड़ी टांगों में जियारत करने पर हंगामा कर दिया और आखिर उसे माफी मांगनी पड़ी।
होना तो यह चाहिए कि विदेशी पर्यटकों को यहां आने से पहले अपने पहनावे पर ध्यान देने के निर्देश जारी किए जाने चाहिए। जैसे मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे में जाने से पहले सिर ढक़ने और जूते उतारने के नियम हैं, वैसे ही पुष्कर में भ्रमण के भी अपने कायदे होने चाहिए। यद्यपि इसके लिए कोई ड्रेस कोड लागू नहीं किया सकता, मगर इतना तो किया ही जा सकता है कि पर्यटकों को सख्त हिदायत हो कि वे अद्र्धनग्न अवस्था में पुष्कर की गलियों या घाटों पर नहीं घूम सकते। होटल के अंदर कमरे में वे भले ही चाहे जैसे रहें, मगर सार्वजनिक रूप से अंग प्रदर्शन नहीं करने देना चाहिए। इसके विपरीत हालत ये है कि अंग प्रदर्शन तो दूर विदेशी युगल सार्वजनिक स्थानों पर आलिंगन और चुंबन करने से नहीं चूकते, जो कि हमारी संस्कृति के सर्वथा विपरीत है। कई बार तो वे ऐसी मुद्रा में होते हैं कि देखने वाले को ही शर्म आ जाए। जब स्थानीय लोग उन्हें घूर-घूर कर देखते हंै, तो उन्हें बड़ा रस आता है। जाहिर तौर पर जब दर्शक को ऐसे अश्लील दृश्य आसानी से सुलभ हो तो वे भला क्यों मौका गंवाना चाहेंगे। स्थिति तब और विकट हो जाती है जब कोई तीर्थ यात्री अपने परिवार के साथ आता है। आंख मूंद लेने के सिवाय उसके पास कोई चारा नहीं रह जाता।
यह भी एक कड़वा सत्य है कि विदेशी पर्यटकों की वजह से ही पुष्कर मादक पदार्थों की मंडी बन गया है, जिससे हमारी युवा पीढ़ी बर्बाद होती जा रही है। इस इलाके एड्स के मामले भी इसी वजह से सामने आते रहे हैं। जहां तक प्रशासन व पुलिस तंत्र का सवाल है, उन्हें तो नौकरी और डंडा बजाने तक से वास्ता है। वह तो कानून और व्यवस्था का पालन ही ठीक से करवा ले, तो काफी है। असल में उसकी तो हालत ये है कि मुंबई ब्लास्ट का मास्टर माइंड व देश में आतंकी हमले करने का षड्यंत्र रचने के आरोप में अमेरिका में गिरफ्तार डेविड कॉलमेन हेडली के पुष्कर आ कर चले जाने तक की हवा भी नहीं लगती। ऐसे में पुष्कर की पवित्रता की जिम्मेदारी संस्कृति की वाहक आमजन की है। उसमें सर्वाधिक दायित्व है तीर्थ पुरोहितों व पुष्कर के नाम पर संस्थाएं चलाने वालों का। यह सही है कि तीर्थ पुरोहितों ने पुष्कर की पवित्रता को लेकर अनेक बार आंदोलन किए हैं, पर कहीं न कहीं वे भी स्थानीय राजनीति के कारण आंदोलनों को प्रभावी नहीं बना पाए हैं। तीर्थ पुरोहित पुष्कर में प्रभावी भूमिका में हैं। वे चाहें तो सरकार पर दबाव बना कर यहां का माहौल सुधार सकते हैं। यह न केवल उनकी प्रतिष्ठा और गरिमा के अनुकूल होगा, अपितु तीर्थराज के प्रति लोगों की अगाध आस्था का संरक्षण करने के लिए भी जरूरी है।

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

कांग्रेस में तो केवल नेहरू-गांधी का ही परिवार चलेगा

कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने तो बगावती तेवर दिखा कर भाजपा हाईकमान को झुकने को मजबूर कर दिया, मगर खुद एक परिवार की धुरी पर ही केन्द्रित कांग्रेस ने आंध्रप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय राजशेखर रेड्डी के पुत्र सांसद वाई. एस. जगनमोहन की राजनीतिक विरासत की मांग को ठुकरा दिया। और उसका नतीजा ये रहा कि जगन ने आखिरकार संसद के साथ पार्टी ही छोड़ दी।
असल में परिवारवाद से उत्पन्न यह समस्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में काफी पुरानी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कांग्रेस ही है, जिसमें जवाहर लाल नेहरू के बाद इंदिरा गांधी, इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी, राजीव गांधी के बाद सोनिया गांधी और अब सोनिया के बाद राहुल गांधी की तैयारी। नेहरू के बाद आज तक गैर कांग्रेसी इसी मुद्दे को लेकर चिल्लाते रहे हैं, मगर आज तक इसका तोड़ नहीं निकल पाया है। यह सवाल दिमाग की दही कर देता है कि आखिर लोकतांत्रिक तरीके से सरकार बनाने वाले इस देश में मतदाता व्यक्तिवाद और परिवारवाद को ही क्यों तवज्जो देता है? ऐसा प्रतीत होता है कि सैकड़ों साल तक राजशाही में रहने की आदत के कारण आजादी के बाद कायम हुए लोकतंत्र में भी हम सामंतवाद, परिवारवाद और व्यक्तिवाद से मुक्त नहीं हो पाए हैं। हम लाख आलोचना करें परिवारवाद व व्यक्तिवाद की, मगर चलते उसी पर हैं। आंध्रप्रदेश में तो एनटीआर ने तेलुगुदेशम के रूप में क्षेत्रवाद को जन्म दिया, जो उनकी मृत्यु के बाद परिवारवाद में तब्दील हो गया। अकेले आंध्र ही क्यों और राज्यों में भी परिवारवाद या व्यक्तिवादी राजनीति ही हावी है। असल तथ्य तो ये है कि जिन राज्यों में कांग्रेस व भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होता है, वहां अलग से कोई परिवार नहीं पनप पाया, जिनमें राजस्थान व मध्यप्रदेश का उदाहरण दिया जा सकता है। भाजपा में आमतौर पर परिवारवाद नहीं है और कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार के अतिरिक्त किसी और को पनपने नहीं दिया जाता। अगर पनपता भी है तो स्वतंत्र रूप से नहीं। आंध्रप्रदेश में जगन मोहन ने उसका उदाहरण बनने की कोशिश की, जिसे कांग्रेस ने नकार दिया। जिन राज्यों में गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई पनपे हैं वे या तो परिवारवाद या व्यक्तिवाद के पोषक रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में फारुख अब्दुल्ला, बिहार में लालू प्रसाद, हरियाणा में देवीलाल के परिवार इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। रहा सवाल नितीश कुमार व मायावती का तो वे भले ही अलग पार्टी बना कर चल रहे हैं, मगर उनकी राजनीति भी व्यक्तिवादी तो है ही।
परिवारवाद अकेले राज्यों में ही नहीं, लोकसभा में भी है। पिछले लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दिग्गजों के कम से कम 35 परिजन या रिश्तेदार चुने गए। इनमें दूर के रिश्तेदारों को भी शामिल कर लें तो यह संख्या अद्र्धशतक के पार पहुंचती है। नेहरू-गांधी परिवार के राहुल गांधी और वरुण गांधी, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगन मोहन, कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के बेटे बी वाई राघवेंद्र, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के बेटे एमके अझागिरी और उनकी बेटी कानिमोझी तथा भतीजा दयानिधि मारन, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित, हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवंती नंदन बहुगुणा के बेटे और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के भाई विजय बहुगुणा, राकांपा के अध्यक्ष शरद पवार की बेटी सुप्रिया सूले और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव, चौधरी चरण सिंह के बेटे व रालोद अध्यक्ष अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी सहित नवीन जिंदल, सचिन पायलट, जितिन प्रसाद, कुमारी शैलजा, अगाथा संगमा, मिलिंद देवड़ा, प्रिया दत्त, नीलेष राणे, समीर भुजबल, ज्योति मिर्धा, मनीश तिवारी, एचडी कुमार स्वामी और दीप गोगोई, सभी परिवादवाद से ही निकले हैं।
इन सब उदाहरणों को देख कर तो जगन मोहन का पारीवारिक विरासत का दावा गलत नजर नहीं आता, मगर कांग्रेस में तो केवल नेहरू-गांधी परिवार का एकाधिकार है, वहां किसी और को परिवारवाद के आधार पर कैसे पनपने दिया जा सकता है, वह भी मुख्यमंत्री जैसे पद पर। हालांकि यह सही है कि हैलिकॉप्टर दुर्घटना में जब वाई एस राजशेखर रेड्डी की मृत्यु हो गई थी तो 140 विधायकों ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का समर्थन किया था, लेकिन अब सिर्फ 20 से 25 विधायक उनके साथ बताए जाते हैं। चिरंजीवी की प्रजाराज्यम के समर्थन के कारण भले ही वे सरकार को गिराने में कामयाब न हो पाएं, कांग्रेस मतदाताओं का धु्रवीकरण में तो कामयाब हो ही जाएंगे।